Friday, June 23, 2017

सर्दी-जुकाम


फिर एक अन्तराल..नया वर्ष आया और पहला माह समाप्त होने को है, उसने लगभग हर दिन कुछ पंक्तियाँ लिखीं, छोटी-छोटी कविताएँ..गद्य लिखने का मन ही नहीं हुआ. पद्य सुकोमल है, गद्य जीवन का यथार्थ है. जून आज फिर गोहाटी गये हैं, परसों आ जायेंगे. उनका गला खराब था, कालीमिर्च, गुड़ और गाय के घी का नुस्खा अपनाना शुरू किया, उससे लाभ भी हुआ. पिछले एक हफ्ते से भी अधिक समय से वे शाम को सीडी लगाकर प्रवचन सुन रहे थे, आज भगवद् गीता पर आधारित प्रवचन है. साहित्य अमृत के स्वामी विवेकानंद पर आधारित अंक को पढ़कर कई नई जानकारियां मिल रही हैं. वे जब छोटे मन से दुनिया को देखते हैं तो अभाव नजर आता है, जब गहराई से देखते हैं तब पूर्णता का अनुभव होता है.

आज सुबह वह नींद में थी पर महसूस हो रहा था कोई जगा रहा है, जब तक नहीं जागी तब तक वह प्रयास करता रहा. एक स्वप्न जैसा कुछ देखा, जिसमें स्वयं को तितली के रूप में देखा. उस दिन नन्हे को फोन पर स्वयं को कहते सुना था कि हर योनि में जैसे तितली, परमात्मा या प्रकृति सबके साथ होते हैं, उन पर नजर रखते हैं. ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, एक बार स्वयं का चेहरा कुछ बदला सा दर्पण में देखा. स्नान करने गयी तो गाउन के बार्डर में कुछ भारीपन महसूस हुआ, छूकर देखा तो  कान का वह बुंदा था, जो कुछ दिन पहले खो गया था, पर वह वहाँ कैसे गया होगा, चारों तरफ देखा कहीं से भी सिलाई खुली नहीं है. इतने दिन से वहीं था तो आज ही उसका पता क्यों चला. कल स्कूल में बच्चों को सिखा सकी, वह भी तो परमात्मा की कृपा ही थी. उनके जीवन में वह कितना निकट है, बस देखने के लिए नजर चाहिए. टीवी पर जैसे ही गुरूजी का प्रवचन सुनना शुरू किया तो पहला वाक्य था, ‘जीवन एक पहेली है, इसे समझना और सुलझाना सीखना पड़ता है, फिर भी कुछ अनसुलझा रह जाता है’.

कल से सर्दी-जुकाम ने परेशान किया है, पिछले दिनों जब जून को खांसी थी, उन्हें परेशान देखकर एक बार उसने प्रार्थना की थी, जून की तबियत ठीक हो जाये, भले उसकी खराब हो, वह स्वयं को ठीक कर सकती है. इसी अहंकार को मिटाने के लिए शायद प्रकृति ने यह उपहार भेजा है. जून अब पहले की तरह स्वस्थ व प्रसन्न हैं. कल शाम महिला क्लब की पार्टी थी. अस्सी महिलाएं आई थीं, हो सकता है उनमें से किसी से संक्रमण पकड़ लिया हो. छोटी बहन से बात की, उसकी गर्दन में भी दर्द था, पिछले हफ्ते बीती उसके विवाह की वर्षगांठ अलबत्ता उन्होंने अच्छी तरह मनायी. आज उसका एक छात्र पढ़ने नहीं आया, पहले सोचा शायद घर पर ही पढ़ रहा होगा, फिर फोन कर लिया. बहुत हँसी आयी जब पता चला उसने माँ से कह दिया था, टीचर ने आने के लिए मना किया है. कुछ बच्चे कितनी आसानी से झूठ बोल देते हैं, उन्हें शायद पता भी नहीं होता कि यह झूठ है.


Thursday, June 22, 2017

पौधों की आँखें


जून कल गोहाटी गये हैं, आने वाले कल दिल्ली जायेंगे. अभी कुछ देर पहले फोन आया उनका. सवा पांच बजे हैं, कुछ देर में प्राणायाम सीखने माली का पिता और उसकी दो पोतियाँ आयेंगी, अब उन्हें आते हुए एक हफ्ते से ज्यादा समय ही हो गया है. छह बजे से भजन है. नैनी के यहाँ से भी भजनों की मधुर आवाज आ रही है. आज दो सखियों से बात की. कल क्रिसमस है, एक अन्य से कल करेगी. सुबह उठी तो सिर में दर्द था, जो अभी तक बना हुआ है, पर बीच-बीच में गायब हो जाता है. देहभाव जब हट जाता है तभी शायद महसूस नहीं होता होगा. ठंड बढ़ गयी है, पर इस वक्त फायर प्लेस में आग जल रही है, कमरा गर्म है. दीदी से फोन पर बात हुई, देहरादून में भी ठंड है, सुबह वह देर से उठने लगी हैं. छोटे भाई का फोन देवप्रयाग से आया, वह आज गोपेश्वर जा रहा है, ऐसा उसने कहा. वर्षों पूर्व उसने वहाँ की रामलीला में अभिनय किया था. इतने वर्षों बाद भी लोगों को याद था. उसका अभिनय सराहा गया था.

अज क्रिसमस है, बादल हैं, मौसम ठंडा है. सूरज जल्दी अपने घर चला गया है. आज वह नर्सरी गयी थी, कुछ फूलों के पौधे लिए. शायद एक महीने बाद इनमें फूल आयें. रंग-बिरंगे फूल जो पौधों की आँखें हैं ओशो के अनुसार, जिनसे वे जगत को निहारते हैं. वह जब अस्तित्त्व को निहारती है, तो वह एकाएक कितना मुखर हो उठता है. एक कोहरे जैसा श्वेत धुआं सा उठने लगता है. घास कितनी सुंदर हो जाती है, चमकदार और जैसे कोई तिलस्म घट रहा है, परमात्मा कितना सुंदर है और उनके चारों ओर है, भीतर की शांति गहराती जा रही है, एक अनोखा जगत छिपा है, इसी जगत के भीतर जिससे वे अनजान ही बने रहते हैं. समाधि का अनुभव कैसा होता है यह तो नहीं मालूम, लेकिन एक अनोखी शांति इस बार उसने अनुभव की है. जून का बाहर जाना भी शायद परमात्मा की इस लीला का एक हिस्सा है. उनके रहते ध्यान इतना घर नहीं हो पाता, अब लगातार दो घंटे बैठना सम्भव है. सद्गुरु की कृपा का अनुभव भी हर क्षण होता है.

नया वर्ष आरम्भ हो चुका है. आज दूसरा दिन है. परसों वे यात्रा पर गये. उससे पूर्व ही तैयारी करते समय ज्ञात हुआ अभी भी मन प्रतिक्रिया करने से बाज नहीं आता, अपने को ऊपर रखने से भी और स्वयं को सही सिद्ध करने से भी, आश्चर्य करने के सिवा और किया क्या जा सकता है. परमात्मा का इतना-इतना प्रेम पाकर भी ऐसा होता है तो..वैसे जिन लोगों के साथ बर्ताव करना होता है उन्हें परमात्मा की खबर कहाँ है ? शायद सहज रूप से सभी के भीतर से जो भी आता है उसे ही परमात्मा का इशारा समझ कर स्वयं को साधना में आगे बढ़ते देना है. कृष्ण इसलिए ही गीता में कहते हैं, प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के उत्पन्न होने पर भी जो सम रहता है वही मुक्त है. जो ‘है’, उस पर ध्यान देना है, जो ‘नहीं’ है उस पर नहीं, तो है ही सब कुछ घेर लेगा. परमात्मा भरपूर है, हर जगह है.. हर समय है... वही उसके द्वारा काम कर रहा है. आज इस क्षण यह बात स्पष्ट हो रही है. परमात्मा उसकी वाणी, उसकी लेखनी, उसके रग-रग में समा गया है. वह उससे दूर नहीं है, वह उसीमें है. वह उसे अपनी बाँसुरी बना ले..अपनी कठपुतली.. अपनी आवाज..अपना संदेश...अपना बना ले, बस इतना ही काफी है..वही ऋत है..वही धर्म है..वही सत्य है..वही नियम है..वही है..वही है..!


Monday, June 19, 2017

जामुनी बयार


दो दिन फिर निकल गये, आज नये सप्ताह का प्रथम दिन है. इस समय बगीचे की हल्की हवा में झूले पर बैठकर डायरी लिखना किसी स्वर्गिक सुख की याद दिला रहा है. आंवले और गुलमोहर के पेड़ों की छाया सामने पड़ रही है. पीछे से कटहल और जामुन के पेड़ों से छनकर आती हवा और धूप पीठ को सहला रही है. उसके आगे बगीचे में गेंदे के फूलों तक चमकदार धूप बिखरी हुई है. बोगेनविलिया के लाल फूलों के गुच्छे हवा में झूल रहे हैं. पीला बोगेनविलिया गुलमोहर के सिर पर ताज बना खिला हुआ है. दुनिया इतनी सुंदर है पर लोग थमकर देखते ही नहीं. कभी-कभी घूमने जाते हैं तब भी थककर लौट आते हैं. खैर...कल झाड़ू वाले जीत गये हैं, पर सरकार बना सकें इतनी सीटें नहीं जीत पाए. देखें अब कैसे बनती है सरकार. जून कुछ ही देर में आने वाले हैं. आज उसने बथुए का रायता व वेज बिरयानी बनाई है. उस दिन जो काम सोचे थे, लगभग सभी शेष हैं, पत्रिका के लिये लेख अलबत्ता भेज दिया है. कल शाम क्लब की मीटिंग है, आज शाम उनके यहाँ सत्संग. इसी तरह दिन हफ्तों में बदल जायेंगे और नया वर्ष आ जायेगा.

फिर कुछ दिनों का अन्तराल..आज लिखने के सुयोग हुआ है. जून आज दिगबोई गये हैं. अभी कुछ देर में बच्चे पढने आ जायेंगे, यह उनका अंतिम वर्ष है. उसके पास दोपहर को ज्यादा समय होगा. बाल्मीकि रामायण की पोस्ट ज्यादा नियमित होगी तब. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके फोटो देखकर सहज ही एक कविता बन गयी, शाम को उसे भेजेगी. आज आखिर दरवाजे पेंट करने वाला कारीगर आ ही गया है. गर्म पानी का बर्नर भी ठीक हुआ. कम से कम इस घर में जो भी समस्या होती है, उसका इलाज हो जाता है. परसों क्लब की मीटिंग है, एक सदस्या का विदाई समारोह भी, जिनके लिए भी उसने कविता लिखी है. दिसम्बर आधा बीत गया है, नये वर्ष के लिए कार्ड भेजने का यह सही समय है. उसे एक लिस्ट बना लेनी होगी.


आज इस मौसम का सबसे ठंडा दिन है. सुबह बादल थे. दोपहर को कुछ देर धूप निकली और इस समय फिर बदली छा गयी है. सुबह सामान्य थी, लॉन में हेज के पीछे ढेर सारे सूखे पत्ते जमा हो गये हैं, उन्हें साफ करवाना है. दोपहर को लंच में सोयाबीन बनाया था, अब बढ़ती हुई उम्र के साथ भोजन हल्का हो तभी ठीक है. बाहर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही है. यहाँ दिन भर किसी न किसी की आवाज अति रहती है, नैनी का संयुक्त परिवार है. पूर्ण शांति का अनुभव इस कमरे में नहीं हो पाटा. बादलों के कारण यहाँ प्रकाश भी थोड़ा कम है, कमरा इतना बड़ा है कि तीन दीवारों पर तीन बल्ब भी आधे कमरे को पूरी तरह प्रकाशित नहीं कर पाते. शाम को एक परिचित के यहाँ जाना है, जिनके साथ वे अरुणाचल प्रदेश की छोटी सी यात्रा पर जाने वाले हैं.

Friday, June 16, 2017

सुबह की बेला


पिछले दो दिन व्यस्तता में बीते. कल विकलांग दिवस का कार्यक्रम ठीक से हो गया. शाम चार बजे से ही क्लब में थी, घर आते–आते नौ बज गये. देर से भोजन किया फिर सो गयी पर नींद देर तक नहीं आई. अभी लेडीज क्लब के कार्यक्रम में समय है. उसे जालोनी क्लब की पत्रिका के लिए आलेख भेजना है. क्रिसमस और नये वर्ष के लिए भी कविता लिखनी है इस वर्ष की, नई और मौलिक सी कोई बात. बड़ी भतीजी व छोटी भांजी का जन्मदिन है, छोटे भाई-भाभी व एक सखी के विवाह की वर्षगांठ है. सभी को इ-कार्ड भेजने हैं. कुछ कार्ड नये वर्ष के लिए भी भेजने हैं. आज बहुत दिनों बाद साहित्य अमृत का दिसम्बर अंक मिला है. बुजुर्ग आंटी अस्पताल में हैं, उनका बांया पैर अकड़ गया है, घुटने से उठाना कठिन है, शरीर अब जवाब दे रहा है, शाम को वे उन्हें देखने जायेंगे.

आज क्लब द्वारा रात को बच्चों को दिए गये भोजन के बिल के भुगतान का दिन था, उसने कहकर थोडा कम करवाया. सुबह एक महिला को फोन करके रंगोली के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने अपने ग्रुप के साथ मिलकर स्टेज से नीचे सुंदर रंगोली बनाई थी. सुबह जैसे किसी ने स्वयं जगाया, वे टहलने गये, पूरे वक्त वह मधुर स्मृति बनी रही. सुबह की बेला कितनी पावन होती है. सुंदर विचार झरते हैं. अब कुछ याद नहीं है. कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, वे इसकी-उसकी बात करने में बहुत उत्सुक लग रहे थे. लोग अपने भीतर देखना ही नहीं चाहते. एक-दूसरे पर अविश्वास और अपनेपन का अभाव ही नजर आता है, खैर उसे तो मस्त रहना है और कोई जानना चाहे चाहे तो उसे मार्ग बताना है.


आज मौसम बहुत अच्छा है, हवा में हल्की सी ठंडक है और धूप भी बहुत तेज नहीं है. एक बगुला अभी उड़ता हुआ गया और हवा का एक झोंका सहलाता हुआ..कल वह उन बुजुर्ग आंटी को देखने गयी तो वह सो रही थीं, दोपहर को भी और शाम को भी. आज सुबह जब वे टहलने गये तो एक दृष्टांत नूना के मन में उभर आया. मानो कोई घर हो उसमें बिजली के कई उपकरण लगे हों. एक बार घर के लोग कहीं जाएँ और सारे उपकरण बंद हो जाएँ तो जो बिजली पहले खर्च होती थी, बच जाएगी. कुछ करने को न पाकर हो सकता है वह वापस स्रोत्त में चली जाये और यदि वह चेतन हो तो अपने को जान ले. ऐसे ही उनका मन देह में रहता हुआ कितना कुछ करता है. रात्रि को जब वे नींद में चले जाते हैं तब मन भी अपने स्रोत में चला जाता है पर उस समय वह सचेत नहीं है सो स्वयं को जान नहीं पाता; यदि जागते हुए मन शांत हो जाये, अपनी हर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाये तो उसे अपना पता चल जायेगा. वैसे भी मन करता क्या है, किसी न किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से कुछ चाह रहा होता है. उसकी मांग कभी खत्म नहीं होती. एक बार वह पूर्ण विश्राम की स्थिति में आ जाये तो खुद को जानना सम्भव है. उनकी ऊर्जा हजार छिद्रों से बाहर बह रही है. उसे भीतर ही सुरक्षित रखना होगा, तभी वह स्वयं को जान पायेगी. 

Thursday, June 15, 2017

गोर्की की पुस्तक- 'मदर'



फिर एक दिन का अन्तराल ! समय कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता. सुबह वे जल्दी उठते हैं, प्रातः भ्रमण करके आते हैं तो न चलने का पता चलता है न कोई प्रयास करना पड़ता है, सब कुछ जैसे अपने-आप ही होता रहता है. वापस घर आकर एक घंटा प्राणायाम-योग आदि में पलक झपकते बीत जाता है. फिर नाश्ता, स्नान आदि करके आज कुछ देर लिखने बैठी तो आलमारी में रैक लगाने बढ़ई व उसके सहायक आ गये, उनके जाते-जाते ग्यारह बज गये, जून लंच पर आए, जाने के बाद लिखने बैठी तो वेल्डिंग वाले लोग आ गये. वे गये तो स्काइप पर दीदी मिल गयीं. सुबह एक सखी से भी बात हुई थी फोन पर. उन बुजुर्ग आंटी से भी अभी बात की. वह उस दिन उन्हें देखकर बहुत खुश हो गयी थीं. आज क्लब में मीटिंग है, वह साढ़े पांच बजे रात का भोजन बनाकर जाएगी. दो दिन से गोर्की की पुस्तक Mother पढ़नी शुरू की है. कितना अच्छा लिखते हैं गोर्की, ऐसे साहित्य को कितनी बार भी पढ़ो, अच्छा लगता है.

एक बदली भरा दिन है आज, आंध्र प्रदेश में तूफान के आसार हैं; सम्भवतः उसका असर यहाँ भी दिखाई दे रहा है. आज भी सुबह की दिनचर्या रोज की तरह रही. जून ने कहा, जो लंच आजकल वे लोग खा रहे हैं, वह घर पर रहकर ही बना सकती है, अभी तो उसकी कहीं जाने की बात भी नहीं है, पर उन्हें जो संस्कार पड़े हैं मन पर कि गृहणी को भोजन के समय घर पर होना चाहिए, वह अपने आप लेकर भोजन नहीं खा सकते, उसी ने उनसे यह बात कहलवाई होगी.

वर्ष के अंतिम माह का पहला दिन, बड़े भाई का जन्मदिन ! मंझले भाई-भाभी आज घर आये हैं, पिताजी ने बताया. छोटी ननद को सर्दी लगी है. बड़ी ननद की दूसरी बेटी को ससुराल में एडजस्ट करने में कुछ परेशानी हो रही है. नन्हा और उसकी मित्र आज मिनी मैराथन में भाग लेने गये थे. बुजुर्ग आंटी की तबियत ठीक नहीं है, उन्हें अस्पताल में दाखिल करना पड़ा है, जून उन्हीं के साथ हैं.इतवार को सभी से बात करो तो सब खबर मिल जाती है. कुछ ही देर में मृणाल ज्योति के संस्थापक दम्पत्ति आने वाले हैं, उसने नाश्ता बना दिया है. विकलांग दिवस के लिए निकट ही क्लब में बच्चे अन्य शिक्षकगण के साथ रिहर्सल कर रहे हैं. शाम होने को है, पश्चिम में लालिमा सुंदर लग रही है. कुछ देर पूर्व झूले पर लेटकर आकाश निहारा तो.. उसी का अनुभव हुआ. क्या यह मन का ही प्रक्षेपण मात्र है, हुआ करे, मन यदि परमात्मा का ही स्मरण करे तभी अच्छा है. उसके सिवाय और कुछ है भी कहाँ, सारी कल्पना भी उसी की है, सारी स्मृति भी उसी की है..जीवन का आधार वही है तो जीवन का सार भी वही है. अंतर का प्यार भी वही है तो चमन की बहार भी वही है. निराकार भी वही है तो सगुण साकार भी वही है. मानव पर सबसे बड़ा उपकार भी वही है और रिश्तों में दुलार भी वही है.



Wednesday, June 14, 2017

झील में कमल


कर्तापन का दंश लगा है जीव को, साक्षी इसका इलाज है. वास्तव में आत्मा न करता है न भोक्ता. स्वयं का पता नहीं है सो कभी देह, कभी मन के साथ स्वयं को जोड़कर देखता है, वही मान लेता है खुद को और उनके द्वारा किये कर्मों को स्वयं द्वारा किया मानेगा ही. वे तो प्रारब्ध वश अथवा तो संस्कारों वश अपना काम करते हैं और आत्मा यदि अपने-आप में रहे तो मन, बुद्धि में कभी कुछ इधर-उधर हुआ भी तो वह स्वयं को उसका कर्ता नहीं मानेगा. आज बहुत दिनों के बाद सद्गुरू की वाणी सुनी, जैसे तन को रोज विश्राम और भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही मन को भी नियमित विश्राम व भोजन चाहिए. मन का भोजन है सत्संग और मन का विश्राम है ध्यान, सो आज से पुनः ध्यान, योग और सत्संग आरम्भ किया है. जीवन को यदि सुंदर बनाना है तो ये सभी आवश्यक हैं. ‘पाठ’ भी नियमित करना होगा. पुरानी दिनचर्या को अपनाना होगा, जिसमें विविध रंग हैं.

बहुत दिनों पूर्व यह इच्छा मन में जगी थी कि बड़े घर के बगीचे में पेड़ के तने से सटकर बैठेगी और कुछ लिखेगी. आज जामुन के पेड़ के नीचे है.

मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है
संस्कारों की मिट्टी है जहाँ
वहीं से रंगो-खुशबू को बाहर लाना है
क्योंकि छिपा है एक स्रोत शुद्ध जल का
मिट्टी की गहराई में
माना चट्टानें भी होंगी मध्य में
कठिन होगी यात्रा
पर जीवन को यदि सचमुच पाना है
तो.. मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है


धूप तेज लग रही है सो लगता है छायादार वृक्ष खोजना होगा. यह सफेद फूलों वाला वृक्ष छाया में है पर यहाँ आस-पास एक अजीब सी गंध है. शायद बाहर से आ रही है या इस वृक्ष की ही गंध है. बिन पत्तों की इसकी शाखाएं कैसी कलाकृति का निर्माण कर रही हैं, एक डाली पर तीन फूल खिले हैं, जिनमें मध्य भाग पीत है. आज उन्हें तिनसुकिया भी जाना है, जीवन वैसे ही चलता रहता है, बाहर कुछ भी नहीं बदलता पर भीतर सब कुछ बदल जाता है. अब भीतर कोई ज्वर नहीं है, सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है. कब विकार जगा, कब कामना उठी, कब मन भूतकल में गया, कब भविष्य की कल्पना में. आत्मा शुद्ध चेतन है, जो प्रकाशक है, जो जानता है, जो देखता है. जब मन शांत होता है तब केवल शुद्ध चेतन ही शेष रहता है. उसे अब पढ़ते व लिखते समय चश्मा लगाना पड़ता है, आँखों की रोशनी कम हो रही है, उम्र बढने के साथ देह में ये परिवर्तन स्वाभाविक हैं. धरती पर बैठकर लिखना अच्छा लग रहा है, पर उसे फोन अपने साथ रखने चाहिए, शायद फोन की घंटी बज रही है. नैनी लैंड लाइन तो उठा सकती है पर मोबाइल उसे रिसीव करना नहीं आता. अब अंदर जाना चाहिये, उसने सोचा.

आज मृणाल ज्योति जाना हुआ, दो अन्य महिलाएं भी थीं. विश्व विकंलाग दिवस के लिए निमन्त्रण पत्र भी मिले, जो सभी के यहाँ भिजवाने हैं. आज दोपहर के भोजन में सलाद, सूप व फल लिए, काफी हल्का लग रहा है. शाम को वे जल्दी ही रात्रि भोजन करेंगे और बाद में टहलने जायेंगे. अभी कुछ देर पूर्व बच्चे पढ़कर गये हैं. उस दिन नैनी के ससुर की हालत पर तरस खाकर जो भाव मन में उठा था, वह सत्य होता नजर आ रहा है. कुदरत किस तरह उनकी हर बात सुनती है. मन का छोटे सा छोटा विचार भी उसकी नजर से बच नहीं सकता. परमात्मा की महिमा का जितना बखान करे, कम है. जो जीवन अपना ही अहित कर रहा हो, जिसके आगे बढने की कोई गुंजाईश ही नजर न आती हो, उसे बदलना होगा, ताकि एक नया कोरा जीवन पुनः आरम्भ हो. सम्भव है नये परिवेश में वह नये ढंग से जीये. एक मशीन की तरह जिए चले जाना अपने व औरों के दुःख का कारण बनना कहाँ तक उचित है ? ईश्वर ही उसका मार्गदर्शक है, वही प्रेरणा देता है, उसके सिवा और कुछ नहीं. यह देह जब तक रहे, स्वस्थ रहे, मन सजग रहे, बुद्धि भी जगी रहे ताकि न अपने लिए न औरों के लिए दुःख का कारण बने. अनंत सुख की राशि परमात्मा चरों और बिखरा हुआ है, उससे जुड़कर ही मानव के भीतर पड़ा वह बीज खिल सकता है, जिसे आत्मा कहते हैं.   



जूट का झूला


कल रात्रि विश्वकर्मा पूजा के लिए एक कविता लिखी थी. जून नहीं हैं वरना आज वे उनके विभाग में होने वाली पूजा में सम्मिलित होते. रात को शुरू हुई वर्षा सुबह तक हो रही थी. परसों बड़ी भांजी से स्काइप पर बात हुई, आज छोटी बहन से हुई. उस दिन जब भांजी से उसके यहाँ जाने की बात की, वह ऐसे बात कर रही थी जैसे उसे कुछ समझ ही न आ रहा हो, उस दिन कुछ अजीब तो लगा था पर सोचा था शायद वह उसकी बात समझ न पायी हो अथवा तो उसे सुनाई ही न दी हो, पर आज छोटी बहन ने कहा, किसी कारण वश वे बच्चे को किसी से मिला नहीं रहे हैं. घर जाकर बच्चे को देखने की उत्सुकता दिखाना ठीक नहीं होगा, फोन पर ही बधाई देना ठीक रहेगा. कल शाम यात्रा की कुछ तैयारी भी कर ली है.

पूरा अक्तूबर और आधा नवम्बर भी बीत गया, आज जाकर कलम उठायी है. इसी बीच दो यात्रायें  भी कीं, पर लिखा कुछ नहीं. कल लिखना शुरू ही किया था कि दूसरे कार्य सम्मुख आ गये और अब जून का इंतजार करते हुए, मलेशिया से लाये जूट के झूले पर बैठकर, जिसे उन्होंने बगीचे में लगा दिया है; पंछियों की आवाज सुनते हुए और शीतल पवन का स्पर्श अनुभूत करते हुए, जब धूप भी छनकर आ रही है और सामने हरियाली की एक चादर बिछी है, वह लिख रही है. इससे बढ़कर स्वर्ग में कौन सा सुख होता होगा जब मन में ‘उसकी’ याद बसी हो और कण-कण में वह स्वयं प्रकट होने को उत्सुक हो. जब प्रकृति का नृत्य अनवरत चलता हो. धूप-छांव का यह जो खेल सृष्टि नटी न जाने कब से खेल  रही है, उसका द्रष्टा होना कितना अनोखा अनुभव है ! नीला आकाश बिलकुल स्वच्छ है, बादल का हल्का सा टुकड़ा भी नहीं है वहाँ, बगीचा भी स्वच्छ है, अभी फूल खिलने में देर है. गमलों पर गेरुआ लगाना है, जून को याद दिलाना होगा, मंगवा लें. दोपहर को उसे दो अन्य सदस्याओं के साथ प्रेस जाना है, क्लब की पत्रिका के कम के लिए. पीछे कुछ मजदूर काम कर रहे हैं, पर वे इतना चुपचाप  हैं, पहले उसे अहसास ही नहीं हुआ उनके होने का. नन्हे का फोन आया, सुबह वह जल्दी-जल्दी उठकर केवल एक सेव खाकर ही दफ्तर जा रहा था, उसका दिन व्यस्त रहने वाला है आज, ऐसा कहकर वह दो दिन से फोन न कर पाने की बात कह रहा था.   

  फिर एक हफ्ता गुजर गया और कुछ नहीं लिखा. कुछ लिखने का मन नहीं होता, मन एक कोरा कागज बन गया है. भीतर भाव उठते हैं, कभी तो इतने अछूते होते हैं, इतने सूक्ष्म कि उन्हें शब्दों में बाँधना ऐसा है जैसे इन्द्रधनुष को रस्सी से नीचे उतारना, कितना स्थूल है शब्दों का संसार और कितना सूक्ष्म है परम का अनुभव..इसलिए आज तक इतना कुछ कहे जाने के बाद भी परमात्मा उतना ही अनछुआ है जैसा वैदिक काल में था.