Friday, October 13, 2017

पुदीने के परांठे


कल रात नन्हे ने कहा, वह आज आएगा, पर सुबह बताया, कल ही आ पायेगा. पिछले दो दिन से वह घर नहीं गया था. काम के बाद दफ्तर में ही सो गया. नींद भी पूरी नहीं हुई थी. उसने सोचा, ये भी आज के कर्मयोगी हैं. सुबह नींद खुली उसके पूर्व किसी ने कंधों को हल्के से हिलाया, फौरन भाभी का ख्याल आ गया. आँख खोली तो कोई भी नहीं था, इसका अर्थ...रात को मच्छर बहुत थे, कानों के पास गुनगुन कर रहे थे. पंखा तेज करके सोयी थी. देर तक नींद नहीं आई, फिर एक स्वप्न आया. दूर तक बारिश के कारण कीचड़ फ़ैल गया है. बाद में हवा चलने लगी और मिट्टी उड़-उड़कर गिरने लगी. नींद खुल गयी. सुबह बड़ी बहन के साथ सब्जी की दुकान तक गयी. नाश्ते में सैंडविच बनाये. बड़े भाई चुपचाप ही रहते हैं ज्यादातर समय, पर वे सामान्य हैं. कभी-कभी परेशान हो जाते हैं. इस समय शाम के छह बजे हैं, घर में सभी रिश्तेदार आये हुए हैं. रह-रहकर सभी को वही बातें याद आती हैं. दरअसल जब जीवन में कोई लक्ष्य न हो तो लोग दुःख को पकड़ लेते हैं.

परसों उन्हें घर जाना है. आज नन्हा भी आ गया है. भाई अब पहले से ज्यादा स्थिर लग रहे हैं. दीदी वापस चली गयी हैं. अभी कुछ देर पहले ही उनका फोन आया, पिछले कुछ दिन उनके साथ सहजता से बीते. सुबह उन्होंने आलू-पुदीने के परांठे बनाये थे. शाम का भोजन नैनी बनाकर चली गयी है. आजकल शहरों में खाना बनवाने का रिवाज बढ़ता जा रहा है. या तो बाहर खाते हैं या बनवा लेते हैं.


कल घर वापस आई, जून हवाईअड्डे लेने गये थे. वह बहुत खुश थे. आज स्कूल गयी. परमात्मा हर पल साथ है यह बात कितनी बार सत्य सिद्ध हुई है. आज भी बच्चों को व्यायाम कराते वक्त एक नन्हा सा भूरा कीट उसके दाँए हाथ की अंगुली पर आकर बैठ गया था, हाथ हिलाते समय भी बैठा ही रहा. अस्तित्त्व किस कदर आपस में जुड़ा है और परम किस कदर उनकी हर पल खबर रखता है इससे बढ़कर इसका क्या सबूत हो सकता है. कल जब भाई एयरपोर्ट तक छोड़ने गये था, तब स्क्रीन के आगे से उडती हुई एक भूरी तितली निकल गयी थी. इतने ट्रैफिक में उसका आना भीतर एक लहर को जगा गया, कितना रहस्यमय है यह संसार....और इसका नियंता..जीवन सचमुच एक उत्सव बन जाता है, जब साधना सहज हो जाती है. 

Thursday, October 12, 2017

जीवन के बाद


आज वह अकेले ही भाई के घर जा रही है. पिछले दिनों कई यात्रायें कीं, सो यात्रा का कोई भय नहीं है. शाम को सात बजे तक भाई के घर पहुँच जाएगी. बड़ी बहन भी नौ बजे तक आ जाएँगी, ऐसा उन्होंने लिखा है व्हाट्सएप पर. अभी कुछ देर पहले मंझली भाभी ने बताया, उनकी बिटिया एयरपोर्ट पर लेने आएगी. भाई को और बहुत से काम देखने होंगे, कल उठाला है, काफी लोग आयेंगे. पंडितजी ने भी सामान की एक लिस्ट पकड़ा दी होगी. आज सुबह अलार्म सुनते ही नींद खुल गयी, पर पांच-दस मिनट उनींदा बना रहा. महसूस हुआ जैसे भाभी बातें कर रही हैं. उन्होंने कहा, वह बहुत खुश हैं और उनके लिए आंसू बहाने की जरा भी आवश्यकता नहीं है. उन्हें प्रेम से याद करना है, दुःख से नहीं (देह से मुक्त आत्मा कितना सुख अनुभव करती है इसका भी पता चला), उठी तो मन शांत था बल्कि प्रसन्न भी. कल कैसा बुझा-बुझा सा था मन दिन भर ही, जून ने ही नाश्ता व खाना बनाया. शाम का टिफिन व रात के लिए सब्जियों को भी छौंक लगा दिया. वह बहुत ही ध्यान रखते हैं. उसकी भावनाओं का बहुत ही सम्मान करते हैं. भाभी जी के जाने का दुःख उन्हें भी कम नहीं हुआ है. कल शाम को उनकी तस्वीरें निकाल कर एक कोलाज बनाया, उसने एक कविता भी लिखी थी श्रद्धांजलि स्वरूप. इतवार को वह लौटेगी. ये छह दिन जून के बिना बिताने होंगे. मोह-माया के बन्धनों से पार जो होना है ! उसने सोचा पिताजी से बात कर लेनी चाहिए. वह अपनी नाजुक सेहत के कारण नहीं आ पा रहे हैं. उन्हें वृद्धावस्था के कारण क्या तकलीफें हैं, किसी से कहते तो नहीं पर उसके कारण कहीं आ जा नहीं सकते.

सुबह के आठ बजे हैं. कल वह समय पर पहुंच गयी थी, घर का वातावरण भारी था, पर उसके कहने पर सभी ने अपने हृदय की बात कही और कुछ ही देर में भाई सहित सबके मन हल्के हो गये. सुबह कुछ मेहमान आये, फिर सब भाई मिलकर फूल चुनने गये. सफाई वाला आया तो उसे रात का बचा खाना दे दिया गया. सफाई के बाद घर ठीक लग रहा है. सुबह उसकी नींद पांच बजे खुल गयी थी. रात को साढ़े ग्यारह बजे तक नींद नहीं आ रही थी. भतीजी एक बार कमरे में आई तो उसने ट्यूब लाइट जलाई, शायद खराब है, उसने स्विच खुला छोड़ दिया होगा. भाभी जी से संवाद पुनः आरम्भ हो गया. वे हर प्रश्न का उत्तर दे रही थीं. फिर भी उसने पूछा, आप इस बात का सबूत दें कि आप यही हैं, तत्क्ष्ण बत्ती जली-बुझी फिर जल गयी. उसका मन हर्ष से भर गया. उनकी शुभकामनायें उन तक पहुंच रही हैं.


आज सुबह नींद अपने आप ही पांच बजे से कुछ पहले खुली. इस समय साढ़े आठ बजे हैं. भतीजी सो रही है, भांजी नहा रही है. मंझली भाभी ने खाना बनाने के लिए एक नौकरानी का इंतजाम कर दिया है. कल दोपहर सभी लोग नीचे हॉल में चले गये थे, फिर एक घंटा शोक सभा हुई. काफी लोग आये थे, हॉल भर गया था. दुःख की खबर सुनकर किसी से भी आये बिना रहा नहीं जाता. सभी लोग उन्हीं बातों को बार-बार दोहरा रहे हैं, जिन्हें याद करके कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है, पर उनके मन में और कुछ है ही नहीं. अतीत ही तो मन है और भावी की आशंका ही तो मन है. जब तक मन है तब तक चैन नहीं मिल सकता पर मानव इस बात को समझने में बहुत समय लगा देता है, कई जन्म भी शायद. अभी कुछ देर में वे नीचे टहलने जायेंगे. जून घर पर अकेले हैं पर वे ठीक हैं. नन्हा आने वाला था, पर अभी तक उसका कोई संदेश नहीं आया है. कुछ काम न हो तो ध्यान ही करना चाहिए, वही ठीक रहेगा, उसने सोचा.

Tuesday, October 10, 2017

लाल और काले शहतूत


कल सुबह एक स्वप्न देखा, वह गुलाम भारत के एक शहर में (वर्तमान पाकिस्तान) किसी शायर की बेटी है. एक कमरा है जिसका दरवाजा दाहिनी तरफ खुलता है तो घर के भीतर जाता है और बायीं तरफ का बाहर, जहाँ पिता खड़े हैं, उनके हाथ में कोई पुस्तक है. कमरे में पाँच-छह वर्ष का बालक( शायद उसका भाई) गेंद से खेल रहा है, तभी वह कमरे में आती है. उसके केश छोटे कटे हैं, चेहरा बिलकुल अबके जैसा ही है, लम्बी है, फ्रॉक पहने हुए है, आकर वह भी उस बच्चे के साथ खेलने लगती है. उम्र चौदह-पन्द्रह होगी. स्वप्न में देखते ही उसने खुद से कहा, अरे, यह तो वह है ! एक और स्वप्न में एक वृद्ध महिला किसी परिचिता के बारे में कुछ बता रही है, जो अशोभनीय है सो वह स्वयं से कहती है, क्या उसे गॉसिप करना भी भाता है  ! आज सुबह उठी तो फिर वही वाक्य याद आया, “उसके जीवन में सब झूठ है”. सत्य तो वही है जो सदा रहता है, जीवन तो प्रतिपल बदलता रहता है, फिर झूठ ही हुआ. आज बहुत दिनों बाद बगीचे में काम करवाया, एक वीडियो भी बनाया. बगिया में ठन्डक थी, सब कुछ धुला-धुला सा था, सफाई भी हो गयी और पौधों को सहारा भी मिल गया. शाम को स्कूल के वार्षिकोत्सव में जाना है, और कल देहली जाना है. फेसबुक पर आस्ट्रेलिया की तस्वीरें पोस्ट कीं आज भी. कोई नई कविता नहीं लिखी कई दिनों से, काव्य श्रंखला पर लिखने वाली कवयित्रियाँ रोज एक नयी कविता ले आ रही हैं. जीवन एक झूठ है एक भाव यह भी है कि उसने कई कविताएँ बाह्य आलम्बनों से प्रेरित होकर लिखी हैं, बहुत सी भीतरी से भी, पर बाहरी आलम्बन से रची कविता स्वतः स्फूर्त नहीं कही जा सकती. काव्य तो उसे ही कहा जा सकता है जो अंतर्मन की गहराई से स्वयं ही प्रकट हो. 

कल सुबह वे उठे तो वर्षा थमी हुई थी पर लॉन में व सड़क पर पिछली रात आये तूफान और ओलों की वर्षा के चिह्न स्पष्ट नजर आ रहे थे. वे सवा ग्यारह बजे दिल्ली जाने के लिए हवाईअड्डे के लिए रवाना हुए और शाम सवा सात बजे अस्पताल पहुँच गये. भाभी से पहले भाई से मिले, वह दुबले लग रहे थे. भाभी का चेहरा भी छोटा सा लग रहा था, अधर सफेद लग रहे थे, उन्हें देखकर मन रुआँसा हो गया. दिल की बीमारी के कारण उन्हें काफी दुःख झेलना पड़ा है. आज सुबह एंजियोग्राफी हो गयी है, सम्भवतः परसों आपरेशन होगा. यहाँ आज मौसम गर्म है. दोपहर दो बजे बड़ी भांजी अपनी बेटी को लेकर मिलने आएगी. उसकी बिटिया दुबली-पतली है, खूब गोरी और चंचल, बचपन में भांजी बिलकुल ऐसी लगती थी. छोटी बहन भी आई है, जो इस समय कहीं बाहर गयी है. जून अपने दफ्तर के काम से गये हैं, दोपहर तक लौटेंगे. परसों वापस लौटना है. कुछ देर पहले पिताजी व सभी भाई-बहनों, भाभियों से फोन पर बात की. शाम को फिर अस्पताल जाना है. वे मंझली भाभी के यहाँ ठहरे हैं, घर जैसी ही सुविधा है. मंझली भाभी के कंधों पर बहुत काम आ गया है, पर परिपक्वता का परिचय देते हुए वह सब संभाल रही है. बड़ी बहन के लिए पूरी तरह समर्पित. उसने उनके शीघ्र स्वास्थ्य के लिए भगवान से प्रार्थना की.


आज प्रातः भ्रमण के लिए गये तो पिछले गेट के बाहर ही शहतूत के पेड़ से पके हुए लाल व काले शहतूत गिरे देखे. कुछ वापसी में उठाये भी. कल शाम छोटा भाई भी अपनी बड़ी बेटी के साथ अस्पताल आया. मंझले भाई से अब उसकी खूब पटती है. भाभी पहले से ठीक लग रही थीं. सभी के भीतर सच्चा स्नेह देखकर मन संतुष्ट है. आज महरी नहीं आई तो किसी अन्य को बुलाया, नाम है मुस्कान, हंसमुख है. भाई ने कहा है वे लोग शाम को पाँच बजे के बाद ही अस्पताल आयें, वे जल्दी लौट भी आएंगे. भाभी जितना आराम करेंगी उतना ही अच्छा है.  

Tuesday, October 3, 2017

एस्पर्गस का पौधा


नये वर्ष के चौथे माह का आरम्भ हो गया है. परसों क्लब की कमेटी मीटिंग है, उसके अगले दिन स्कूल का वार्षिकोत्सव है और उसके भी अगले दिन उन्हें चार दिन की छोटी सी यात्रा पर निकलना है. वापस लौटने पर मृणाल ज्योति भी जाएगी. आज तेज वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा. सुबह स्कल में ही थी बड़ी ननद का फोन आया, उन्होंने बिटिया का रिश्ता पूरी तरह से तोड़ देने के लिए हामी भर दी है, वह बेहद दुखी थी. मंझली भाभी से बात हुई, बड़ी भाभी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, शायद आज पुनः अस्पताल चली गयी होंगी. ‘भारत एक खोज’ के एपिसोड में आज महाभारत दिखाया जा रहा है. फेसबुक पर एक कवयित्री ने उसे एक काव्य श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए नामित किया है, पर किसी कारण उससे नहीं पाया, उन्हें कल लिखना होगा. जून के दफ्तर में एक अधिकारी ने अपने नाती होने की ख़ुशी में मिठाई बांटी. उसने सोचा वह भी फोन पर उन्हें बधाई देगी. माली की पत्नी अपने पुत्र के जन्म प्रमाण पत्र के लिए फार्म भरवाने आई थी, कितना सुंदर नाम रखा है पुत्र का, ओम ज्योति. जो पौधे वे शिलांग से लाये थे, उनके साथ एक अस्पर्गस का पौधा अपने आप ही आ गया था, चीड़ के पौधे नहीं बचे पर यह बच गया, लम्बा होता जा रहा है. माली से कहकर उसमें एक लकड़ी लगवा दी है. क्लब की उपसचिव ने व्हाट्स एप ग्रुप बना दिया है कमेटी सदस्याओं का, पहले ही दिन ढेर सारे संदेश आये.

आज सुबह चार बजे से कुछ पहले ही उठी. उठने से पूर्व ही कोई कह रहा था, उसका सारा जीवन एक झूठ है, फिर एक चाय का कप भी दिखा. सुबह से ही मन पूछ रहा है, जीवन में क्या-क्या है जो असत्य है. वह जून से कहती है कि वह जब बाहर जाते हैं, प्रसाधन सामग्री, चाय आदि सामान न लायें, पर स्वयं उनका इस्तेमाल करती है. यही असत्य सबसे पहले नजर आया. अब से उनका इस्तेमाल नहीं करेगी, ऐसा तय किया है. उसके संकल्पों में बल नहीं है, कहीं यह इशारा उसकी तरफ तो नहीं था. उसके अनुभव क्या संतों की वाणी का प्रभाव मात्र हैं ? मात्र कल्पना हैं ? भीतर कई सवाल हैं. हो सकता है स्वप्न यह कह रहा हो, आत्मा के सिवाय सभी कुछ असत्य है. एक गीत है न, झूठी दुनिया झूठी माया..झूठा सब संसार..

नहीं देखा जा सकता आकाश को जमीन पर रेंगते हुए
बंद कमरों में बैठकर ताजी हवा से वंचित ही रहेंगी श्वासें
परमात्मा हुए बिना परमात्मा से नहीं होती मुलाकात
जज्बातों को समझे बिना खुद के, नहीं समझेगा कोई दूसरों के जज्बात
जीवन चलता रहे यह आस कितनी व्यर्थ है
जीवन को गहराई से नापे तभी कोई अर्थ है
आसमानी रंग क्यों भाता है सभी को
याद दिलाता है अपनी विशालता की
क्षीरसागर के समान श्वेत मेघों की आकृतियाँ
कथाएं कह जाती हैं निजता की !

कल कुछ नहीं लिखा. आज स्कूल गयी, लौटने में बारह बज गये, शायद सवा बारह. ड्राइवर पूरे धैर्य के साथ साढ़े नौ बजे से वहीं खड़ा रहा. बच्चों ने सूर्य नमस्कार ठीक से सीख लिया है. ध्वनि मिश्रण के लिए किसी को बुलाया था, उसी कार्य में देर हुई.          


Thursday, September 28, 2017

भारत एक खोज


जीवन कितना अनोखा है, तितलियों और पुष्पों के रंगों सा अनोखा, आकाश के विस्तार सा और सागर की गहराई सा..इसका हर पल एक नये विश्वास से भरा है. आज की सुबह एक नया संदेश लेकर आई लगती है. कल रात्रि भगवद् गीता का अठारहवां अध्याय पढ़ा. अनोखी पुस्तक है गीता अर्थात ग्रन्थ है, भगवान की वाणी है और इस युग में भी आज के समय में भी भगवान की वाणी मौजूद है सद्गुरू के रूप में. आज नैनी को एक काम न करने पर याद दिलाया तो आवाज में हल्का सा रोष था, जो बाद में स्वयं को ही चुभने लगा. आत्मा जो हिमशिखरों सी शुद्ध है, गंगाजल से भी पावन है, जरा सा धुआं भी नहीं सह सकती, और वे अज्ञानवश उस पर कितने कुठाराघात करते रहते हैं. कुम्हला जाती होगी आत्मा, पर अब और नहीं, भीतर-बाहर की पूर्ण शुद्धि करनी है. धी, स्मृति और धृति को मजबूत करना है. परमात्मा की कृपा हर क्षण उसके ऊपर है, आज भी स्कूल में एक तितलीनुमा कीट उड़ते-उड़ते उसके पास आया, मानो अस्तित्त्व उसे आश्वस्त करना चाहता है. उसका प्रेम अहैतुक है. उसे उसका मान रखना चाहिए. जीवन सत्य की साक्षी दे, उसका हर पल परम की खुशबू से ओत-प्रोत रहे, जीवन की सार्थकता इसी में है. शाम को नियमित ध्यान करना होगा, समय का सदुपयोग यदि सेवा में नहीं हो पा रहा है तो ध्यान में ही होना चाहिए. अभी भी भीतर कई संस्कार हैं जिन्हें ध्यान में दूर होना है.

कल से उन्होंने ‘भारत एक खोज’ के अंक देखने आरम्भ किये हैं. जून के एक सहकर्मी ने इसके सभी एपिसोड दिए हैं. वर्षों पहले देखी यह श्रृंखला बहुत अच्छी लगी थी उस समय. आज दोपहर छोटी भांजी से स्काईप पर बात की, विपासना के बारे में उसे बात करके अच्छा लगा. शाम को जून के एक सहकर्मी व उनकी पत्नी आए, उन्हें भोजन के लिए कहा, पर वे देर से खाते हैं, दोनों सब्जियां टिफिन में पैक कर उन्हें दीं, साथ ही केन का बना वह बैग भी जो शिलांग से उनके लिए खरीदा था. नन्हे का फोन आया, वह काफी उत्साहित है. उसके यहाँ हैकाथन चल रहा है, एक सौ बीस लोग हैं जो रात भर जागकर कोई नयी प्रोग्रामिंग करेंगे.

सुबह के सात्विक वातवरण में परमात्मा की निकटता का अहसास कितना स्पष्ट होता है, यूँ तो वह हर वक्त ही निकट है. आज स्कूल गयी तो बादल छाये थे, पर बरसे दोपहर को जाकर. शाम को गुलाब वाटिका के निकट भ्रमण पथ पर टहलने गये तो हवा में फूलों की सुवास छायी थी. दीदी से बात हुई, वे लोग आस्ट्रेलिया से अगले महीने भारत लौटेंगे. व्हाट्सएप पर रुमाली रोटी बनाने का एक वीडियो देखा, कमाल का हुनर है.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. शनिवार को दिन भर मेघ बरसते रहे और इतवार को तेज धूप निकली. जैसे बाहर का मौसम बदलता है वैसे ही भीतर का मौसम भी बदला करता है, वे न जाने कितनी बार गर्म होते हैं न और कितनी बार ठंडे. उनका दिल समता में नहीं रह पाता. आज सुबह उठी तो चार बजे थे, कोई समझा रहा था, ‘अहम् को गलाओ’. जून कितना ध्यान रखते हैं, दफ्तर से फोन करके दवा लेने के लिए याद दिलाया और उसने उन्हें उलाहना दिया. अहंकार ही तो है यह, फिर दो बर्र दिखाई दिए. उसे कुछ जताने के लिए अस्तित्त्व जैसे उनका रूप धर कर आया था. कितना जीवंत है वह, हर घड़ी, हर पल वह है, यहीं है, साथ है उनके. आज सुबह स्कूल से लौटते समय छोटी बहन व छोटे भाई से बात की. बड़ी भाभी अस्पताल से घर आ रही हैं, दो दिन रहकर वापस जाएँगी. उसके अगले दिन उनका आपरेशन होगा. कल जून से उसने कहा, उन्हें जाना चाहिए. वह भी तैयार हैं. सम्भवतः अगले सप्ताह वे जायेंगे. 

Wednesday, September 27, 2017

शिलांग की सुन्दरता


रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. आज नेहू में दूसरा और अंतिम दिन है. प्रातः भ्रमण के समय श्वेत जंगली फूलों के चित्र लिए. कैम्पस के अंदर जंगल में चीड़ के वृक्षों के अनेकों छोटे-छोटे पौधे उग आये हैं, उनमें से कुछ साथ ले जाने के लिए पानी और मिट्टी सहित एक छोटे से गिलास में रखे, हो सकता है उनमें से कोई बच जाये. यह अतिथि गृह पुराने तरीके का है. लकड़ी का फर्श है और बड़ा सा बैठक खाना है. जिस कमरे में वे ठहरे हैं वह नया बना है. नौ बजे वे बायो टेक्नोलॉजी विभाग में गये, जहाँ विभागाध्यक्ष ने स्वागत किया. एक छात्रा ने अपना अध्ययन प्रस्तुत किया. बाद में उनका पुस्तकालय भी देखा, जहाँ हिंदी की भी सैकड़ों पुस्तकें थीं.दोपहर का भोजन कालेज की कैंटीन में हुआ. उसके बाद शिलांग के दर्शनीय स्थान देखने निकले. सर्वप्रथम डॉन बोस्को संग्रहालय देखा, जो पूरे उत्तर-पूर्व भारत की तस्वीर पेश करता है. वहाँ से शिलांग की सबसे ऊँची चोटी पर गये, जहाँ कई दुकानें खुल गयी हैं तथा मार्ग भी पहले की तरह हरा-भरा व सुनसान नहीं रहा है. उसके बाद एलिफेंटा झरना देखा. वापसी में त्रिपुरा भवन भी गये. गोल्फ मैदान में कुछ तस्वीरें लीं, झील को दूर से निहारते हुए आगे बढ़े. पोलिस बाजार का एक चक्कर लगाया. जून के एक सहकर्मी जो साथ गये थे, उनकी ससुराल शिलांग में है, वहाँ गये. उनका घर भी लकड़ी का बना है और बहुत पुराना है. जहाँ अति स्नेह से उन्होंने नाश्ता कराया. वापस आकर कुछ देर टहलते रहे. कल सुबह सात बजे गोहाटी हवाई अड्डे के लिए निकलना है.  

कल दोपहर ढाई बजे वे घर लौट आये. घर की सफाई कराते-कराते शाम हो गयी फिर भोजन बनाते-बनाते रात. सुबह उठी तो स्कूल जाना था, बच्चों को सूर्य नमस्कार का अभ्यास कराया, जो उन्हें स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम में प्रस्तुत करना है. लौटकर दोपहर का भोजन बनाया और अब समय मिला है कुछ देर बैठकर खुद से बात करने का. दोपहर को सोते समय लगा, वह स्वयं को सोते हुए देख रही है. अभी कुछ देर पहले दो सखियों से बात की, भाई-भाभी से भी, कल पिताजी से की थी. छोटी बहन से व्हाट्सएप पर बात हुई. दीदी से अभी रह गयी है, व्हाट्सएप पर छोटे से वीडियो में उन्हें व्यायाम करते देख उनके नाती को थिरकते देखा, बहुत अच्छा लगा. यात्रा विवरण भी लिखना है, फेसबुक पर तस्वीरें भी लगानी हैं. आज भी ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा, इस वर्ष की तीसरी यात्रा से लेखन में कुछ दिनों का व्यवधान पड़ा है. अभी भी पूरा मुँह खोलने में थोड़ी असुविधा होती है, ठीक एक सप्ताह पहले दांत निकलवाया था. डाक्टर ने मुँह का व्यायाम बताया था. तन और मन को जो भी हो आत्मा तो सदा एक रस है, वही सत्य है, शेष तो सब कुछ बदल रहा है. नन्हा पूना में है, आज रात वापस जायेगा या कल सुबह. उसने नया घर देख लिया है. अच्छी जगह पर है, और एक मित्र के साथ वह उसमें रहेगा. उसे फोन किया पर वह व्यस्त था.


आज सुबह भी नींद समय पर खुल गयी. कोई कह रहा था, वासना दुष्पूर्ण है अर्थात इसका कोई अंत नहीं. आज एक कविता लिखी. मृणाल ज्योति गयी. स्कूल की संस्थापिका की बाँह में दर्द है, उन्हें गर्दन के पास रीढ़ की हड्डी में भी दर्द रहता है. जीवन में कितना दुःख है, पर सभी मानव ने खुद ही एकत्र किया है. बगीचे में सफेद गुलाब की झाड़ी बहुत बढ़ गयी है, उसके लिए द्वार जैसा एक आधार बनवाना है, जून से कहा है बांस मंगवाने के लिए. किचन के बाहर का नल खराब हो गया है, उसकी शिकायत दर्ज करवानी है. बगीचे में तुलसी पुदीना के पौधे बहुत शीघ्र बढ़ रहे हैं, पत्तों का आकार तुलसी जैसा पर सुगंध पुदीने जैसी है. एक सखी का फोन आया, वैदिक गणित सीखने के लिए कह रही थी. जून से उसने पूछा तो उन्होंने कहा पहले ही इतनी व्यस्तता है, हर दिन कम से कम तीन-चार घंटे निकालने होंगे, उसका खुद का भी विशेष मन नहीं है, एक पुस्तक के द्वारा जो अब भी उसके पास है, कुछ वर्ष पहले कई सूत्र सीखे थे. आज स्कूल में फिर एक उड़ता हुआ भंवरा आया और उसकी बाँह पर बैठ गया. मन-प्राण भीतर तक एक उपस्थिति से भीग गये. चेतना हर जगह है, वही तो है, जो विभिन्न रूपों में प्रकट हो रही है !   

Monday, September 25, 2017

बड़ा पानी -उमियाम झील


कल शाम चार बजे वे गोहाटी पहुँचे थे. शाम को बाजार गये फिर एक मित्र परिवार से मिलने. रात्रि भोजन भी वहीं किया. आज सुबह ब्रह्मपुत्र के किनारे टहलने गये. नदी के तट पर कई वृक्ष लगे थे, वर्षों पुराने वृक्ष बहुत सुंदर थे पर किनारा टूटा-फूटा था और स्वच्छता का बहुत अभाव था. सड़क के दोनों किनारों पर फूलवालों की कई दुकानें लगी थीं. होटल लौटते समय फल मंडी से होते हुए आये. लौटकर स्नान, नाश्ता आदि कर नौ बजे ही गणेश गुड़ी स्थित पासपोर्ट दफ्तर के लिए रवाना हुए, जहाँ उसे अपने पासपोर्ट का नवीकरण कराना था. वहाँ काफी भीड़ थी पर उन्हें दस बजे से पहले ही बुला लिया गया. तीन भागों में सारी कार्यवाही पूरी हुई, दफ्तर में सभी कार्य काफी व्यवस्थित ढंग से हो रहे थे. साढ़े ग्यारह बजे तक सब काम हो गया. बाजार से असम सिल्क के कुरते के लिए वस्त्र खरीदा. दोपहर बाद पुनः उन्हीं मित्र के यहाँ गये, शाम को जून अपने एक सहकर्मी के घर ले गये. जिनका पुश्तैनी मकान काफी बड़ा है, तथा एक पहाड़ पर बना है. खेती भी है, उनके भाई-भाभी तथा भतीजों से मिलना हुआ. स्वादिष्ट नाश्ता करके वे होटल आ गये हैं. कल सुबह शिलांग के लिए निकलना है. कल वे चेरापूंजी जायेंगे.


‘नार्थ इस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी’ (नेहू) के पुराने गेस्ट हॉउस के वीआईपी कक्ष ‘संख्या-एक’ में बैठकर डायरी लिखने का सम्भवतः यह पहला और अंतिम अवसर है. आज सुबह ही गोहाटी से शिलांग के लिए बल्कि कहें चेरा पूंजी के लिए रवाना हुए. मेघालय और असम काफी दूर तक साथ-साथ चलते हैं, सड़क के मध्य जो विभाजक है उसके बायीं तरफ असम है और दायीं तरफ मेघालय है. असम की सीमा समाप्त होते ही पहाड़ी रास्ता आरम्भ हो जाता है. सडकें ऊंची-नीची हो जाती हैं तथा चीड़ के वृक्ष दिखने लगते हैं. मार्ग में उमियाम या बड़ा पानी नामक एक सुंदर झील पर रुककर कुछ तस्वीरें उतारीं. यह दस वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाली अति विशाल कृत्रिम झील है, जहाँ बिजली का उत्पादन भी किया जाता है. 

चेरापूंजी में प्रवेश करते ही दृश्य पटल बदलने लगा, रास्ता अच्छा था. गाड़ी तेज रफ्तार से चल रही थी. एक तरफ घाटियाँ दिखने लगी. पहाड़ों की ढलान जो मीलों तक नीचे गयी थी, घने जंगलों से ढकी थी. दूर के पर्वत नीले लग रहे थे और उनके पीछे धुंध थी. धूप तेज थी. आगे चलकर झरने देखे तथा प्राकृतिक गुफाएं भी, जो बहुत विचित्र हैं. इनके भीतर वर्षा के जल के निरंतर गिरने से पत्थरों ने जाने कितने वर्षों में टूटकर विभिन्न आकर ग्रहण कर लिए हैं. उनमें प्रवेश करके आड़े-तिरछे रास्तों से गुजरकर बाहर आना एक रोचक व रोमांचक अनुभव था. गुफाओं से लौटकर एक शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां ओरेंज कंट्री में भोजन किया. भोजन बनाने वाली महिला थी तथा परोसने वाली भी सभी महिलाएं थीं. वे लगातार उस स्थान को साफ करने में लगी थीं. शिलांग के लिए वापसी की यात्रा में एक अन्य झरना दिखा, जो दूर से दिखाई दे रहा था. काफी ऊँचाई से गिरता हुआ वह नीचे घाटी में मीलों दूर गिर रहा था. शिलांग के सुंदर दृश्यों को देखते हुए वे नेहू वापस आ गये हैं. यह कैम्पस भी बहुत सुंदर है. चीड़ के जंगलों के कारण इसकी सुन्दरता और भी बढ़ जाती है. कल वे शिलांग लेक, लेडी हायड्री पार्क, गोल्फ कोर्स आदि देखने जायेंगे. डॉन बोस्को संग्रहालय भी देखने लायक स्थान होगा. आज नन्हे से बात हुई, उसने एक मित्र के साथ घर लेने का निर्णय किया है.