Thursday, November 16, 2017

कटहल का पेड़



ओशो ने कहा है, जीवन की तरह मृत्यु भी सीखने की बात है. मृत्यु जीवन के साथ जुड़ी है. उसका आगमन कभी भी हो सकता है. उसके लिए स्वयं को तैयार रखना होगा. शाम को वह पुनः गयी, लोगों की भीड़ लगी थी. महिला के माता-पिता व पुत्र सभी आ गये थे. सात बजे के लगभग मृतक की देह भी आ गयी, फिर कुछ कर्मकांड के बाद उन्हें ले गये. अगले दिन सुबह जब वहाँ गयी. दो-एक लोग ही थे, उसे नाश्ता खिलाया थोड़ा सा. उसका दुःख देखा नहीं जाता. उसने जिस बात की कल्पना भी नहीं की थी वैसा उसके साथ घट गया है. जून आज नुमालीगढ़ गये हैं, कल शाम तक लौटेंगे. कल सम्भवतः ‘असम बंद’ है. फ्रिज ने फिर काम करना बंद कर दिया है.

व्यर्थ हैं ये अश्रु जो गम में बहते हैं
बेबस है आदमी ये इतना ही कहते हैं
रुदन यह तुम्हारा किसी काम का नहीं
लौट के न आये जो परलोक में रहते हैं

क्या मौत नहीं होती रिश्ते का खात्मा
दो दिन का ही संग साथ था यही मानना
जो उड़ गया वह पंछी परदेसी ही तो था
संयोग से मिला था, बिछड़ना था मानना

आज सुबह से वर्षा हो रही है. जून आठ बजे तक आने वाले हैं. शाम को लॉन में सूखे पत्तों और फूलों को हटाया. बच्चों को खेलते देखा. बच्चे कितने खुश रहते हैं, मानो कोई खजाना हाथ लग गया हो, जैसे उसे मिल गया है भीतर एक खजाना ! शाम को टहलते समय छोटी बहन की भेजी तस्वीरें मिलीं, जो उसने उसी क्षण अपने बगीचे से भेजीं थीं, जवाब में उसने भी कटहल के वृक्ष की तस्वीर भेजी, कटहल अब बड़े हो गये हैं, उनमें से एक, एक दिन तोड़ेगी, कल ही वह दिन हो सकता है. फ्रिज तो ठीक नहीं हुआ है, सो सब्जी तो अभी लानी नहीं है. दोपहर को भोजन के बाद कुछ देर के विश्राम के लिए लेटी तो उसे जगाने के लिए एक स्वप्न आया, जिसमें वह मीठा आम खा रही है, नन्हा आम काट रहा  है, वह हँस भी रहा है. उसकी ख़ुशी से कैसे उनकी ख़ुशी जुड़ी है, शायद इसी तथ्य की ओर इशारा कर रहा था यह स्वप्न. मोह और ममता को स्पष्ट रूप से देखने की ताकीद भी कर रहा था. आनंददायक स्वप्न था पर सिखा रहा था कि जहाँ से ख़ुशी मिलती है, वहाँ से उतना ही दुःख मिल सकता है. उस महिला को इतना दुःख इसलिए ही तो हो रहा है कि उसने उतना ही आनन्द पाया था. हर सुख की कीमत चुकानी पड़ती है.


Tuesday, November 14, 2017

नया सवेरा


मृत्यु और जीवन – ६     


रहती है एक अव्यक्त देह..इस देह के भीतर
वह सूक्ष्म देह ही धारण करती है नई देह
इच्छाओं, कामनाओं और अभीप्साओं से बनी है सूक्ष्म देह
जो धारण किये है पिछले जन्मों की स्मृतियाँ
जो जान लेता है यह सत्य  
धारण करता है अपार वैराग्य
और मुक्त हो जाता है वासनाओं और कामनाओं से
क्या अर्थ है बार-बार उसे दोहराने का
जो मिटता रहा है हर बार देह के साथ ही
फिर शुरू हो जाती रही है नई दौड़
हो जाता है जारी एक बार फिर अपने को भुलाने का प्रयास भी
अंतहीन है यह प्रक्रिया
कभी तो जागना होगा
मौत का सच जानना होगा
चक्रव्यूह से निकलना होगा बाहर
अन्यथा बार-बार सहना होगा दर्द
बार-बार बहाने होंगे आँसू
न जाने कितनी बार देखी जा चुकी है यह जीवन की फिल्म
फिर भी नहीं चुकती वासना
फिर-फिर दोहराया जाता है वही खेल 
और खोया रहता है एक भ्रम में जीवन
फिसलता जाता है हाथों से
वह जीवन जो वास्तव में मृत्यु है
मात्र आवरण है जीवन का  !

मृत्यु और जीवन – ७     

मृत्यु से घिरे हुए भला
कोई जी कैसे सकता है
जिसे भय है मरने का वह जी कहाँ पाता है
यात्रा करनी होगी हर चेतना को
अपने आप को जानने के लिए
जगानी होगी प्यास भीतर उस अनाम की
मौत असत्य कर देती है जीवन के अनुभवों को
लेकिन एक ऐसा जीवन भी है जो सत्य है
 परम मुक्ति को प्राप्त आत्मा नहीं धरती देह कोई
क्योंकि नहीं शेष है कोई कामना अब उसकी
मृत्यु एक छाया है जीवन की
उससे कोई भागेगा कैसे
भला लड़ेगा कैसे...
उसका सामना नहीं करता कोई
ड़ाल कर आँखों में आँखें
मुक्त हुआ जा सकता है जानकर ही उसको
ज्ञान से जगाना होगा एक नया सवेरा

जिसमें मृत्यु का कोई नहीं है डेरा !

Monday, November 13, 2017

जीवन की यात्रा


मृत्यु और जीवन – ४  

जीवन को जानते
ही खो जाती है मौत
मौत को जानते ही मिल जाता है जीवन !
जीने की कला के साथ सीखनी होगी मरने की कला भी
तभी मुक्त होगा मन मृत्यु के भय से
संकल्प भीतर जगाना होगा
स्वयं को जीते जी एक बार तो मारना होगा
देह से अलग होकर स्वयं को देखना होगा
जीवन ज्योति को जगाना होगा
जीना होगा उस ज्योति के रूप में
देह को जानना होगा मात्र आवरण के रूप में
अनुभव ही हल करेगा मौत का रहस्य
दूसरे घर में जाने का तथ्य
जब एक तन थक जाता है
नहीं रख पाता जीवन को सुव्यस्थित ढंग से
तब बदल लेता है अपना घर जीवन
देह एक अवसर है आत्मा के लिए
जब खो जाता है एक अवसर
बंद हो जाता है एक द्वार
तब मिल जाता है दूसरा
और जीवन की यात्रा पुनः शुरू हो जाती है !
मृत्यु और जीवन – ५    

हाँ, दर्द होता है जब बिछड़ता है कोई अपना
क्योंकि देह से ही होता है परिचय सबका
अन्तस् की खोज करने कोई नहीं उतरता
जाना ही होगा अपने भीतर
तभी मिलेंगे वे उत्तर
जो मौत उठाती है
तभी मुलाकात होगी वास्तविक जीवन से
जो कभी नहीं मरता
जब जानेगा वह पदार्थ ही नहीं है मानव

एक आत्मा है जो कभी नहीं मिटती...!

Friday, November 10, 2017

मृत्यु और जीवन

मृत्यु और जीवन - २ 

 जीवन का अनुभव ही क्या नहीं है मौत का अनुभव
चेतना सरक जाती है जब भीतर
देह को छोड़कर..
भीतर एक अंकुर है कोमल जीवन का..
जिस पर आवरण है देह का
देह मरेगी पर जीवन बचेगा
देह जिसका आवरण है
उससे मिलन करना होगा
जड़ें दिखाई नहीं पड़तीं
वृक्ष दिखाई पड़ता है
अंकुर दिखाई नहीं पड़ता
बीज दिखाई देता है
भीतर है जो अव्यक्त
वही अभिव्यक्त होता है बाहर
अभिव्यक्ति को ही जो समझते हैं जीवन
वे डरे हैं हर पल मौत से
कंपते हैं प्राण उनके
परिचित हैं जो भीतर उस अव्यक्त से
तैयार रहते हैं हर पल उस मौत के लिए
जो केवल देह को ही घटती है !

मृत्यु और जीवन – ३  

विलीन हो जाता है तब मृत्यु का भय
जब मिलता है भीतर अमृत का कोष
तब बाहर भी घटता है संतोष
देह जाएगी एक दिन तय है
तब उसे किस बात का भय है
वह जानता है मृत्यु का राज
जैसे कोई दिए की बाती उढ़का दे  
सिमट आये प्रकाश और फिर समाप्त हो जाये
उर्जा वापस लौट गयी जिस क्षण
देह से टूट जाता है नाता उसका
जो देख ले जीते जी सिमटने को ऊर्जा के
वह जानता है नहीं मरा हूँ मैं
तैयार हूँ एक नई यात्रा के लिए
जानते हुए भीतर जाना होगा
शांत होकर भीतर सिकुड़ना होगा
देह से अलग खुद को देखना होगा
जैसे प्रकाश है बल्ब में वैसे ही
जीवन है देह में
देह से अलग स्वयं को देखना ही
ध्यान है !

Thursday, November 9, 2017

जीनिया की पौध


आज सुबह भी प्रतिदिन की तरह थी. शीतल, शांत और बाद में वर्षा भी होने लगी. नर्सरी गयी थी, जीनिया की पौध नहीं मिली, शाम को फिर जाना है चार बजे. दोपहर को फिर भूचाल आया. नेपाल, भारत, अफगानिस्तान, चीन सभी जगह. गोहाटी और दिल्ली-देहरादून में भी पता चला, उन्हें यहाँ पर कोई अहसास नहीं हुआ. वे सोये थे उस वक्त. उसके पेट में हल्का सा दर्द था, बहुत दिनों से कुछ नया लिखा भी नहीं, बहुत सी भावनाएं ही शायद जमा हो गयी हों. नन्हे से सुबह बात हुई, वह एक नये संबंध में बंध रहा है. लडकी के पिता अन्य धर्म के हैं, जून को इस पर एतराज है, पर यह कोई मसला नहीं है. आजकल बच्चों के लिए रिश्ते बनाना और तोड़ना एक सामान्य सी बात है. नन्हे से बात हुई, उसने कहा, अगले महीने वह घर आएगा. जून भी परसों कह रहे थे, उससे मिलकर उसके भविष्य के बारे में बात करनी है, आखिर चेतना तो एक ही है, इधर की चाह उधर पहुँच ही जाती है, विचार सूक्ष्म होते हैं, अति शीघ्र यात्रा कर लेते हैं. सुबह जून से उनके नये प्रोजेक्ट के बारे में बात हुई. जो वे गोहाटी में करने वाले हैं, प्लास्टिक से तेल बनाने का प्रोजेक्ट. उसे भी कोई सार्थक कार्य हाथ में लेना चाहिए. अपने समय व ऊर्जा का सही उपयोग करने के लिए. लगता है, रजोगुण बढ़ रहा है. अभी बाल्मीकि रामायण का कितना काम शेष है और पढ़ने का काम तो है ही. पढ़ने से ही नया लिखने का सूत्र मिलेगा. भीतर जाकर मन को टटोलना होगा. पर भीतर तो मौन है, शांत और आनंद से भरा मौन..उसे ही लुटाना है किसी न किसी रूप में. उस शांति से ही सृजन करना है. अगले महीने दीदी का जन्मदिन है और उनकी नतिनी का भी, उनके लिए भी कुछ लिखना है.

कल सुबह जब नर्सरी से जीनिया की पौध व एक पौधा लेते हुए वापस आई तो जून का फोन आया. कम्पनी के एक अधिकारी का कैम्प में रहते हुए नींद में ही देहांत हो गया है. सुनकर कैसा सा तो लगा, दोपहर को उनके घर गयी, व्यथित महिला बहुत रो रही थी, दो घंटे रुककर लौटी तो ‘मृत्यु और जीवन’ लिखा.

मृत्यु और जीवन - १

मौत एक पल में छीन लेती है कितना कुछ
माथे का सिंदूर हाथों की चूड़ियाँ
मन का चैन और अधरों की हँसी
पत्नी होने का सौभाग्य ही नहीं छीनती मौत
एक स्त्री से उसके कितने छोटे-छोटे सुख भी
पिता का आश्रय ही नहीं उठता सिर से
पुत्र की निश्चिंतता, उसका भरोसा भी
अश्रु बहते हैं निरंतर ऑंखें सूज जाती हैं
रुदन थमता नहीं विधवा का
रह-रह कर याद आती है कोई बात
और कचोट उठती है सीने में
रोते-रोते चौंक जाती है
कह उठती है, मुझे साथ ले चलो
पर कोई जवाब नहीं आता
कभी नहीं आया,
उस पार गया कोई भी लौट कर नहीं आया
क्या है मृत्यु ?
जो छीन लेती है जीवन का रस अपनों का
भर जाती है ऐसी उदासी
जो कभी खत्म होगी इसका विश्वास नहीं होता
मर सकता है कोई भी.. कभी भी.. किसी भी क्षण
तो क्यों न सामना करें इस प्रश्न का
क्यों न रहें तैयार हर पल.. सामना करने मौत का...
मौत जो जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है
जिसकी नींव पर ही जीवन की भीत टिकाई है
जीवन के पीछे ही छुपी है मौत
करती रहती है इंतजार उस पल का
जब शांत हो जायेगा सांसों का खेल
और झपट लेगी वह हलचल जीवन की
मुर्दा हो जायेगा यह शरीर
पर भीतर जो जान थी उसे
छू भी नहीं पायेगी मौत
कौन जानता है उसका होना
वही जो उतरा है भीतर जीते जी
जिसने चखा है मृत्यु का स्वाद जीते जी
जिसने पहचान की है घर के मालिक से !  


Monday, November 6, 2017

मन का आकाश


भारत एक खोज’ में कालिदास का प्रथम भाग देखा. भारत का अतीत कितना गौरवशाली था. आज बड़े भाई से बात हुई, उन्होंने आर्ट ऑफ़ लिविंग का कोर्स शुरू कर दिया है, आज दूसरा दिन था. सुदर्शन क्रिया भी की. अभी कुछ देर पहले अचानक वर्षा आरम्भ हो गयी, कहीं से बादल का एक टुकड़ा आ गया और कहने लगा उसे तो यहीं बरसना है. अब धूप खिली है और आकाश में बदली भी नजर नहीं आती. अब भला प्रकृति के आगे किसका जोर चलता है. नन्हे ने कल शाम फोन किया, उनकी कम्पनी का वार्षिक कार्यक्रम आज से शुरू हो रहा है, कल शाम तक चलेगा. वे लोग इंडोनेशिया और फिलिपींस में भी काम शुरू कर रहे हैं. काफी तेजी से ये लोग आगे जा रहे हैं. क्लब की सेक्रेटरी पतिदेव के तबादले के कारण यहाँ से जा रही हैं, उनके लिए कुछ लिखने का मन है पर उनसे जानकारी लेना इतना आसान नहीं है, वह बहुत बोलती हैं, इधर-उधर की कुछ ज्यादा..पुरानी कविता से ही काम चलाना होगा.

सुबह चार बजे से कुछ पहले ही नींद खुल गयी. मौसम ठंडा था जब वे बाहर निकले. कल शाम को नैनी देर से आई, भीतर शिकायत की हल्की सी रेखा दिखी जो स्वयं को भी पसंद नहीं आई, अब दुःख की हल्की सी भी रेखा भी सहन नहीं होती, मन का आकाश नीला और स्वच्छ होना ही मान्य है अब बुद्धि को. नन्हा आज भी व्यस्त होगा, उसने अपनी नींद, भूख सब भुला दिए हैं, खुद से बड़ा कुछ प्राप्त करना हो तो ऐसा करना ही होगा. वे खुद को बचाते हैं तो खुद से छोटे ही रहते हैं.

आज ‘मदर्स डे’ है, नन्हे ने शुभकामना दी. उसकी कम्पनी का विज्ञापन भी देखा. संडे स्कूल के बच्चों को भी दिखाया और मातृ दिवसकी महत्ता बतायी. कल शाम वे कल्पना पटवारी को सुनने गये थे, जो भोजपुरी गायिका हैं. उसे पहले एक मित्र परिवार के लिए सोयाबीन दाल व आलू की सब्जी बनाकर ले गये. उनके यहाँ जाने पर वे लोग हमेशा पूरी-सब्जी खिलाकर भेजते हैं, कहते हैं, उनके घर की परंपरा है. ‘भारत एक खोज’ में आज का अंक राजा हर्षवर्धन पर है. आज सुबह पिताजी से बात की, चौरासी साल की उम्र में वे अभी तक प्रतिदिन हिंदी व अंग्रेजी में एक-एक पन्ना अखबार से देख कर लिखते हैं. उन्हें इस तरह अनुशासित जीवन बिताते देखकर कितना अच्छा लगता है, वह उनके लिये पुनः एक कविता लिखेगी या एक परिचय ! भाई से बात की, आज कोर्स का अंतिम दिन था. उन्हें कोर्स अच्छा लगा. गुरूजी के जन्मदिन के उत्सव में भी वह जायेंगे.

आज स्कूल गयी थी, छोटे बच्चों ने योग कक्षा का आनन्द लिया पर बड़े धूप के कारण परेशान थे. जून को आज आने में देर होगी, कोई प्रेजेंटेशन है. आज ही ‘एक जीवन एक कहानी’ में तेरह वर्ष पूर्व में हुए उनके प्रेजेंटेशन की बात लिखी है. समय कितनी तेजी से बीत रहे है. देखते-देखते और कुछ वर्ष बीत जायेंगे और उन्हें यहाँ से चले जाना होगा. जीवन भी एक दिन अंत को आएगा, इस देह का जीवन. भीतर का जीवन तो सदा से है, सदा रहेगा. आज तीन पौधे लायी है नर्सरी से. तीनों को गमलों में लगाना है. कल सुबह ही सम्भव होगा जब माली आएगा. अगले महीने उन्हें लेह जाना है. मंझले भाई ने गेस्टहाउस में कमरा आरक्षित कर दिया है.


Wednesday, November 1, 2017

पंछियों के गीत


बगीचे में पत्ते बिखरे हैं. कल आंधी-बारिश आई थी, उसके बाद से सफाई नहीं हुई है. माली की पत्नी को बुलवाया था पर शायद वह व्यस्त है. उसकी दूसरी पत्नी का बच्चा छोटा है. कुल मिलाकर घर में पांच बच्चे हैं, व्यस्तता तो रहेगी ही, शायद थक कर सो रही हो. इस समय भी बदली छाने को है, शाम को पुनः वर्षा होगी, मौसम विभाग का भी यही कहना है, लो, बूँदें पड़नी शुरू भी हो गयी हैं, जबकि कहीं-कहीं नीला आकाश झांक रहा है. शाम को शोकाकुल परिवार में जाना है, आज उनका दामाद आ रहा है. मालिन आ गयी है, सोचा, उसके साथ कुछ देर बगीचे में ही रहेगी. कल शाम क्लब में मीटिंग थी, एक गायिका ने ऊंची आवाज में गीत गाये, संगीत बहुत तेज था. एक ने नृत्य किया, छह ढोलकिये थे साथ में, उसे जरा नहीं भाया. कार्यक्रम का स्तर बढ़ने की बजाय घटने लगे तो दर्शकों की संख्या घटना स्वाभाविक है. नन्हे का फोन आया था, वह चेन्नई के रास्ते में होगा इस समय. वह स्वतंत्र है और इसका आनन्द ले रहा है.

रात्रि के सवा आठ बजे हैं. आज बुजुर्ग आंटी का श्राद्ध था, वे सुबह से ही व्यस्त थे. कल मई दिवस के कारण जून का दफ्तर बंद था, सुबह सब कार्य धीमी गति से हुआ, फिर अस्पताल गये. माली के पिता को साईकिल से गिरने के कारण चोट लग गयी है.

आज यूँ ही ख्याल आया, कितने दिनों से किसी से फोन पर लम्बी बात नहीं की है. इतना ही लिखा- चलो कुछ बातें करें
फोन पर ही सही मुलाकातें करें
कहें सुख-दुःख अपने सुनें कुछ औरों से
पकड़ रखे हैं व्यर्थ ही जो जोरों से
चलो बहा दें हर आंसू जो छिपा रखा है
किसी बहाने तो सही घातें प्रतिघातें करें

सवा तीन बजे हैं दोपहर के, कैसी प्यारी पवन बह रही है. सामने खड़ा युक्लिप्टस का वृक्ष मस्ती में झूमे जा रहा है. मई का आगमन हो चुका है पर गर्मी का नामोनिशान नहीं, सुबह घनघोर वृष्टि हुई. प्रातः भ्रमण पर भी नहीं जा सके. जून आज शिवसागर गये हैं, एक कनिष्ठ सहकर्मी के विवाह भोज में सम्मिलित होने. शाम तक लौट आयेंगे. लॉन में बैठकर लिखने का सुयोग बहुत दिनों बाद बना है. एक पक्षी लगातार कूक रहा है, दूर से दूसरा पक्षी भी उसके साथ युगलबंदी पर उतर आया है. आज बुद्ध पूर्णिमा है. भगवान बुद्ध की संसार को कितनी बड़ी देन है विपश्यना, यानि विशेष तरह से देखना, देह और चित्त की सच्चाई को अनुभव के स्तर पर जानकर सारे विकारों से मुक्त होने की कला. आज सुबह जून को तमस में घिरे देखकर वह उससे भी ज्यादा तमस में घिर गयी जब उनके कृत्य की निन्दा की. तत्क्षण हृदय पर कैसा भार लगने लगा था, विपश्यना के द्वारा ही इससे मुक्त हुई. वे सदा ही दूसरों के निर्णायक बन जाते हैं यह सोचे बिना कि इससे स्वयं की कितनी हानि होती है. बड़ी भांजी से बात की, उसके ससुर को दुर्घटना में चोट लग गयी है, आपरेशन कुछ दिनों बाद होगा. असजगता का परिणाम कितना दुखद होता है, किन्तु नेपाल में जो हजारों पीड़ित हैं, वे कहां असजग थे? इस देह में आना ही असजगता की निशानी है. उनका अस्तित्त्व देह के बिना भी रहता है शुद्ध रूप में, तृष्णा ही उन्हें बांधती है, सत्व गुण भी बांधता है,, मात्र तमो या रजो गुण ही नहीं बांधता !