Sunday, April 7, 2013

कादम्बिनी - हिंदी पत्रिका




नन्हा उस पर गया है, जून ऐसा कई बार कहते हैं, कल शाम को उसे परीक्षा के लिए घबराहट होने की शिकायत करते देख उसे भी इस बात का विश्वास हो गया. इतना छोटा सा बच्चा जिसे सब कुछ याद है, परीक्षा से इस तरह क्यों घबरा सकता है, जब इतनी छोटी थी तो शायद वह भी घबराती होगी, कुछ याद नहीं पड़ता. आज सुबह भी थोडा नर्वस था शायद इसीलिए नाश्ता भी ठीक से नहीं किया, उसने मन ही उसे शुभकामनाएँ भेजीं. जून का फोन आया है उन्हें आज मोरान जाना हैऔर नल से पानी गायब है, कैसे स्नान होगा और फिर खाना बनेगा. सवा नौ हो चुके हैं, आज कपड़े भी नहीं धुल पाएंगे.

  आज भी नन्हा नर्वस था पर कल से कहीं कम. केवल दो पेपर और रह जायेंगे उसके आज के बाद. स्वीपर अभी तक नहीं आया है, कल कह रहा था, उसे अस्पताल जाना है ताकि वह  उसकी अनुपस्थिति की खबर सेनिटेशन दफ्तर में न करे. कल रात बेहद गर्मी थी, फिर आधी रात के बाद शायद वर्षा हुई, जिससे कुछ ठंडक हुई, पहले तो उमस के कारण नींद ही नहीं आ रही थी. दो हफ्ते रह गए हैं उन्हें घर जाने में, कभी-कभी लगता है, पहली बार इतना लम्बा सफर अकेले करने जा रही है, जाने कैसे कटेगा. यह भी हो सकता है कि इतना लम्बा सफर करने के बाद नन्हा भी और वह भी कुछ सीखे, साहसी बने. कल शाम कादम्बिनी में एक लेख पढ़ा, प्रज्ञा चक्षु से आत्मा को देखने का जिक्र है उसमें. जानना तो दूर आजकल आत्मा पर विश्वास ही कौन करता है, मात्र देह ही सब कुछ है आज के भौतिकतावादी युग में. देह को सजा-संवार के रख सके वही सभ्य है, वही सफल है. मन और आत्मा तक पहुंचने का न तो किसी के पास समय है और न जरूरत....सच बोलने का साहस कोई करे भी तो सच सुनने को कोई तैयार नहीं. आत्मिक और अध्यात्मिक उन्नति की बातें अब पिछड़ेपन की पर्याय बन गयी हैं.
 
  जून आज तीसरे दिन भी मोरान गए हैं, उन्हें अपने काम में इस तरह व्यस्त देखकर व सफलता मिलने पर उसे खुशी होती है. दोपहर को भोजन के वक्त वे घर पर नहीं होंगे यह बात नन्हे और उसे दोनों को अखरेगी. नन्हे का परसों अंतिम इम्तहान है, उसके लिए अंग्रेजी का पेपर बनाना है, सो यह लिखना छोड़कर पहले वही करने में वह व्यस्त हो गयी.







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