Friday, July 1, 2016

हरी हरी वसुंधरा


इसी महीने की इक्कीस तारीख को गुरूजी दुलियाजान आ रहे हैं. यह भी हो सकता है वे कुछ दिन पहले तक सोच भी नहीं सकते थे. कल वह कोलकाता में थे, शिवरात्रि उत्सव मनाया गया. उन्होंने कहा, परमात्मा हर क्षण साथ है और जैसे वे उसे याद करते हैं, वह भी उन्हें याद करता है, चाहता है.
आज टीवी पर सुना...वसुधा, वसुंधरा, धरा, धरित्री, पृथ्वी, मही, भू, भूमि, मेदिनी, श्री, विष्णुपत्नी इतने सारे नाम हैं धरती माँ के ! हर एक का अलग अर्थ है. वसुधा कहते हैं क्योंकि कितना सम्पदा इसके पास है, वसु धन भी है और रहने का साधन भी है. वह देवता भी है, वसुधा का अर्थ इसलिए घर मात्र नहीं है, घर की आत्मीयता भी है ! धरा, धरित्री, धरती का अर्थ धारण करने वाली अर्थात सहनशीलता, क्षमा, शक्ति, क्षमता, माँ, उदारता ! भू का अर्थ है होना, पृथ्वी जड़ नहीं, स्थिर नहीं, किसी आकर्षण में घूम रही है. भूमि का अर्थ होने की प्रक्रिया को आधार देने वाली अर्थात जिन्हें वह आधार देती है उनको भी एक-दूसरे के लिए क्रियाशील देखना चाहती है. विष्णु ने मधु-कैटभ का वध किया, उसके मेद से बना स्थूल पिंड ‘मेदिनी’ कहलाया. श्री भूदेवी है आश्रय देने वाली. इन सब अर्थों को लेकर पृथ्वी की अवधारणा करें तो वसुधैव कुटुम्बकम का आधा अर्थ समझ में आता है, शेष इस पर रहने लोगों की आत्मीयता से बनता है !
चचेरे भाई का पैर डाक्टर बचा नहीं पाए. अभी पिताजी से बात की उन्होंने बताया. जीवन में बड़ी दुर्घटनाएं भी घटती हैं पर समय के साथ-साथ मानव उनकी भीषणता को पार कर जाता है ! Right parenting creates right citizen अर्थात ‘उचित पालन पोषण से ही जिम्मेदार नागरिक का निर्माण संभव है’ या ‘माता–पिता द्वारा सही पालना जिम्मेदार नागरिक को जन्म देती है’ अथवा जिम्मेदार नागरिक के निर्माण हेतु उचित पलना आवश्यक है’ या फिर जिम्मेदार माता-पिता ही जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करते हैं’ उपरोक्त सभी वाक्य उसने लेडीज क्लब के बुलेटिन के लिए कल लिखे. कल मीटिंग है. एक सखी ने फोन करके कहा वह सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग ले रही है. एक बात के लिए कई बार फोन किया, वे अपनी कितनी शक्ति यूँ ही गंवाते हैं.  

गुरूजी दुलियाजान आ रहे हैं, यह बात उसे कई दिनों से ज्ञात थी. लेकिन पहले-पहल यकीन ही नहीं हो रहा था. इस छोटी सी जगह में इतने बड़े गुरूजी आ भी सकते हैं, इस बात का यकीन नहीं हो रहा था. पर अब तो पक्की हो गयी है यह बात कि वह आ रहे हैं ! हवाएं भी यही गीत सुना रही हैं, पंछी भी यही तराना गा रहे हैं, चारों ओर कोई धीमे-धीमे स्वरों में कह रहा है, वह आ रहे हैं..उसका सद्गुरु आ रहा है. जितना पीछे लौटती है उनकी कृपा का आवरण घना होता हुआ पाती है. तब यहाँ पहला एओल कोर्स भी नहीं हुआ था. वह पुकारती थी, प्रार्थना करती कि ईश्वर उसके लिए कोई गुरु भेज दे, इस स्थान से कहीं जाकर गुरू की तलाश करना उसके लिए असम्भव था. प्रभु ने सुन ली. यहाँ एओल का पहला कोर्स हुआ, फिर दूसरा जिसमें उसे क्रिया के दौरान अनोखा अनुभव हुआ. उस दिन से ही सही अर्थों में उसकी आध्यात्मिक यात्रा का शुभारम्भ हुआ, जो अनवरत जारी है, कितने विकारों से ग्रसित था मन, धीरे-धीरे जैसे कोई काँटों पर से रेशमी वस्त्र को उतारता है, मन को विकारों के काँटों से मुक्त किया और आज मन का दर्पण भीतर की शांति को, प्रेम को, आनंद को प्रतिबिम्बित करता है. भीतर उनके यदि कटु स्मृतियाँ हैं तो प्रेम का सागर भी है. वे वही हैं. एक बार अपने सच्चे स्वरूप की झलक मिल जाने के बाद कोई विषाद नहीं रह जाता, सारे संशय मिट जाते हैं. गुरु उनके स्वरूप का बाह्य रूप ही तो है, वह इतना पावन इतना महान है कि वे बरबस ही उसकी ओर खिंचे जाते हैं. वे उसमें अपनी झलक ही देखते हैं, वह ईश्वर का भेजा दूत है जो उन्हें पुनः उनके घर का पता बताने आया है, सद्गुरु आ रहे हैं ठीक नौ वर्षों बाद जब ज्ञान मिला, इतने वर्षों में उसे पकाया और अब अगले नौ वर्षों में उसका जीवन कैसा होने वाला है इसका बीज बोने सद्गुरु आ रहे हैं !

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