Monday, August 21, 2017

चेत्तना की ज्योति


शाम के साथ बजने वाले हैं. आज दिन भर धूप के दर्शन नहीं हुए. इस समय तापमान छह डिग्री है. सुबह उठकर कुछ देर प्राणायाम किया फिर बाहर टहलने भी गयी, चारों और श्वेत कोहरा था जो चेहरे पर शीतलता की छाप छोड़ जाता था. उसके बाद किचन में पहले नाश्ता फिर भोजन बनाने-खाने-खिलाने में व्यस्त. महरी दो दिन से नहीं आ रही है. छोटी भाभी बहुत मिलनसार है और सारा काम आराम से निपटा लेती है. दीदी परिवार सहित कल आयीं थीं, सबसे मिलकर अच्छा लगा. बड़ी भांजी से फोन पर बात हुई, चचेरा भाई मिलने आया था, वह कुछ ज्यादा बोलने लगा है, अकेले रहने के कारण उसका मन अब शायद पहले सा मजबूत नहीं रह गया है, फिर भी शारीरिक रूप से पहले से स्वस्थ लगा. पिताजी आज सुबह कह रहे थे, यात्रा पर जाने से पूर्व उनका दिल घबराता है, दो दिन बाद उन्हें जाना है.

कल चचेरी बहन अपने दो बच्चों के साथ आयी थी, बच्चों ने नन्हे के साथ अच्छा समय बिताया. आज सुबह नौ बजे घर से चले और ढाई बजे दिल्ली पहुंच गये. बड़ी गाड़ी थी, स्विफ्ट डिजायर, यात्रा आरामदेह थी सिवाय दिल्ली में भारी ट्रैफिक का सामना करने के. मंझले भाई-भाभी का नया घर बहुत सुंदर है. शाम को भाभी की माँ से मिलने गये, जो अस्थमा की मरीज हैं. उसके बाद आर्मी रेस्टोरेंट में रात्रि भोजन के लिए. सूप, सिजलर, पनीर टिक्का, तंदूरी रोटी दाल और एक सब्जी. पिछले दिनों छोटी भाभी ने भी काफी व्यंजन बनाये थे. कश्मीरी चटनी, अप्पा, मलाई मेथी मटर तथा खजूर के लड्डू, हल्दी वाला दूध. कल शाम शायद बड़ी भतीजी मिलने आये. दोपहर को बड़ी भाभी के यहाँ जाना है. जून टनोर में हैं, जो जैसलमेर से भी आगे हैं.

आज ठंड कल से भी ज्यादा है. खिड़की से बाहर सिवाय कोहरे की सफेद चादर के कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा. सुबह छह बजे ही उठ गयी, साढ़े आठ बजे तक तैयार थी. पिताजी भी नहा-धोकर नाश्ता करके बांसुरी बजा रहे हैं, चैन की बांसुरी ! नन्हा कल अपने मित्र के यहाँ रहा, अपने मित्रों के साथ कल रात आग जलाकर उसने उत्सव मनाया. आज उसे वापस जाना है. रात्रि के दस बजने को हैं. ठंड बदस्तूर है. दोपहर को बड़ी भाभी ने सरसों का साग व मक्की की रोटी खिलाई. शाम का भोजन भी वहीं किया और आधा घन्टा पहले ही वे लौटे हैं. परसों इस वक्त वे अपने घर में होंगे, समय कैसे बीत रहा है, पता ही नहीं चल रहा.

वे घर लौट आये हैं. सुबह साढ़े पांच बजे उठे और गोभी के पराठों का नाश्ता करके, निकल पड़े, भाई ने चाय बनाई, जैसे मंझला भाई अपने घर पर बनाता है, जैसे जून यहाँ हार्लिक्स बनाते हैं. बड़े भाई को आटा गूंथते हुए भी देखा, अच्छा लगा, वे पहले से ज्यादा शांत और स्थिर लगे. मंझला भाई भी पहले से ज्यादा स्वस्थ लग रहा था. भाभी लेकिन कुछ ज्यादा ही मोटी हो रही हैं. दोनों की बेटियां बहुत लाड़-प्यार में पली हैं. एअरपोर्ट पर दो किताबें खरीदीं, दो दीदी ने दी हैं, एक पिताजी से पढ़ने के लिए ली है, ‘शिवोहम’, वहाँ पढ़ रही थी, पूरी नहीं पढ़ पायी. बहुत अच्छी किताब है. चेतना का दीपक जलता है देह की उपस्थिति में ही, प्राणवायु ही उस दीपक को प्रज्ज्वलित करती है, देह दीपक है, चेतना ज्योति है, चेतना स्वयं को ज्योति स्वरूप जान ले तो सारा भय नष्ट हो जाता है. पिताजी का गला दिल्ली की ठंड में खराब हो गया है, पर उन्हें वहाँ अच्छा लग रहा है. ठंड से बचने के लिए भाभी ने उन्हें गर्म शाल दी, भाई ने ट्रैक सूट और हर समय वे उनके ध्यान रखते हैं. भाभी की माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, वह अस्पताल में हैं, उनसे भी बात हुई. घर आकर अच्छा लग रहा है. परमात्मा उसे किसी उद्देश्य के लिए वहाँ ले गया था. नन्हे ने अपने दिल की बात बताकर स्वयं को हल्का किया, उसका दिल टूटा है पर वह हिम्मती है. भीतर की पीड़ा को व्यक्त नहीं होने देता, स्वयं पर हावी भी नहीं होने देता. परमात्मा ही उसके जीवन का मार्ग तय करने में उसे मदद करेंगे. कल शाम को क्लब में मीटिंग है. अगले हफ्ते प्रेस जाना है. पहली तारीख को एक सखी को भोजन पर बुलाना है. जून ने हरे चने के चावलों बनाये हैं रात्रि भोजन में.


Friday, August 18, 2017

इ रिक्शा में यात्रा


कल से गले में खिचखिच है, आज ज्यादा बढ़ गयी है. तीन दिन बाद यात्रा पर निकलना है, स्वास्थ्य  ठीक हो जायेगा उससे पूर्व ऐसी उम्मीद है. दोपहर बाद साढ़े तीन होने को हैं, सूर्य की अंतिम धूप में बगीचे में कुरसी पर बैठी है वह, मुँह में मुलेठी है, जिसकी मिठास गले को राहत देती है. कुछ देर पूर्व रजाई ओढ़कर लेटी पर भीतर कोई जाग गया है जो बेवक्त सोने नहीं देता. एक दिन तो गहरी नींद सोना ही है. उसके पूर्व कुछ काम हो जाये तो ही अच्छा है. जीवन के पल व्यर्थ न जाएँ, परमात्मा की दी इस अपार क्षमता का उपयोग हो सके ऐसा प्रयत्न सदा ही चलना चाहिए. आज बहुत दिनों के बाद रीडर्स डाइजेस्ट का एक अंक पढ़ा. मलाला की पुस्तक कल खत्म हो गयी, उसका एक भाषण भी सुना. कल शाम को जून के दफ्तर में काम करने वाली एक महिला आई थी अपने पति के साथ. चाहती है उसका तबादला गोहाटी हो जाये, इसी सिलसिले में बात करने आये थे वे. पति का काम वहीं है, ससुराल भी वहीं है. यदि ऐसा न हो पाया तो दोनों के पास अलग होने के सिवा कोई उपाय नहीं है. महिलाओं ने भी पुरुषों की तरह काम करना तो आरम्भ कर दिया है पर इसके लिए कितनी क़ुरबानी देनी पडती है. सास-ससुर को तो अब बहू से कोई भी उम्मीद रखने का अधिकार नहीं रह गया, पति भी यह नहीं कह सकता कि महिला नौकरी छोड़ दे. बगीचे में पानी डालने माली अभी तक नहीं आया है, वैसे एक दिन छोड़कर भी पानी दिया जा सकता है, रात्रि को इतनी ओस गिरती है कि सब कुछ भीग जाता है.

उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, ऐसा समाचारों में सुना. यहाँ भी मौसम अपेक्षकृत ठंडा है पर धूप भी खिली है. व्हाट्स एप पर दीदी का संदेश सुना. विदेश में रहने वाला बड़ा भांजा परिवार सहित आया है, उससे भी भेंट हो जाएगी. कल स्वप्न में किसी पिछले जन्म का दृश्य देखा, मोह भंग होता है जब पिछले जन्म की सच्चाई सामने आती है. जीवन एक खेल ही तो है, एक स्वप्न मात्र..इसे जो गम्भीरता पूर्वक लेते हैं, वे व्यर्थ ही दुखी होते हैं. मन कितना चंचल है, पल में तोला पल में माशा, इस मन को देखना भी एक मजेदार खेल है. यहाँ सब कुछ बदलने वाला है, सत्य एक है और वह सदा एक सा है अटल. उससे जुड़े रहकर जगत को देखना है, वहाँ न कोई चाह है न ही कोई अभाव ! नये वर्ष के लिए कविता लिखनी है जो वापस आकर पोस्ट करेगी अथवा तो वहीं से मोबाइल पर.


इस समय धूप तेज है, दोपहर के डेढ़ बजे हैं. सुबह ठीक चार बजे किसी ने जगा दिया, जैसे ही उठकर बाथरूम जाने लगी तो अलार्म बजा. तैयार होकर साढ़े पांच बजे ही वे रेलवे स्टेशन आ गये. नन्हे के साथ शताब्दी की तीन घंटे यात्रा का वक्त कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. कल जब वह दिल्ली पहुंची, नन्हा उसे लेने एयरपोर्ट आया था, उसे सुखद आश्चर्य हुआ. स्टेशन पर छोटी भाभी और भतीजी लेने आये थे. बैटरी वाली रिक्शा में बैठकर वे घर आ गये. ढोकला व लड्डुओं का नाश्ता किया. धूप में बैठकर फल खाए. दीदी व बुआजी से बात की, दीदी कल आ रही हैं और बुआजी परसों. पिताजी पहले से काफी दुबले हो गये हैं, भोजन भी पहले से कम हो गया है, वैसे अन्य सभी बातों में पूर्ववत हैं. वे उनके साथ दिल्ली जाने के लिए तैयार हैं.

Thursday, August 17, 2017

मलाला की किताब


आज छोटे भांजे का जन्मदिन है, अभी तक उससे बात नहीं हो पायी. तीन द्वारों से उसे खटखटाया अवश्य, फोन, sms तथा फेसबुक. आजकल संवाद के जितने ज्यादा साधन हैं, बात करना भी उतना ही कठिन, सभी व्यस्त हैं सो अपनी ओर से बधाई दे दी, इस पर ही संतोष करना होगा ! आज नुमालीगढ़ की तस्वीरें लगाई हैं फेसबुक पर. वह तितलियों का पार्क और नदी, सभी जीवंत हो गये जैसे. इस समय भी बगीचे में धूप है, बोगेनविलिया, गुलाब, जरबेरा और गुलदाउदी के फूल खिले हैं, पीठ पर मध्यम आंच देती सूर्य रश्मियाँ भली लग रही हैं. आज अक्षर अपने आप ही छोटे-छोटे बन रहे हैं डायरी पर, शायद कुछ है भीतर जो छोटा कर रहा है. कल जो कविता लिखी थी शायद इसी कारण..पर यह आवश्यक तो नहीं कि हर बार कविता अच्छी ही बन पड़े, हाँ, यह तो देखना चाहिए, पोस्ट करने लायक है या नहीं. खैर, आज बहुत दिनों बाद पुनः ‘पतंजलि योग सूत्र’ उठाई है, वही जो नन्हे ने खरीदी थी उसके लिए बंगलूरू में.

परसों मलाला को टीवी पर नोबल पुरस्कार प्राप्त करते देखा व सुना और कल लाइब्रेरी में उसकी पुस्तक भी मिल गयी. एक दिन पाकिस्तान की प्रधानमन्त्री बनेगी यह लडकी. कल पत्रकारों को जवाब देते हुए उसने स्वयं ही यह बात कही थी. मलाला ने इतनी छोटी उम्र में इतना साहस दिखाया है, लोग मरते दम तक भयभीत रहते हैं. परमात्मा ऐसे ही लोगों के रूप में धरा पर आता है. सुबह आज उठने में देर हुई, कल रात नींद देर से आई. कल शाम वे जिम गये, पहली बार अभ्यास किया, शरीर में हल्का खिंचाव महसूस हो रहा था, शायद न सो पाने में यही कारण रहा हो; अथवा उससे भी बड़ा कारण था मन का पूरे होश में आ जाना, सोने के लिए थोड़ी सी बेहोशी तो चाहिए. ध्यान के अभ्यासी को नींद पहले से कम होना स्वाभाविक ही है. कल से यात्रा की तैयारी भी आरम्भ करनी है. कुछ उपहार खरीदने हैं. नन्हा भी आज रात यात्रा पर निकल रहा है, दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद आदि जगहों पर जायेगा, उन्हें अपनी कम्पनी के लिए कैम्पस इंटरव्यू करने हैं. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसे शुभकामना के रूप में कविता लिखी है, शाम को जून उसकी तस्वीर लगायेंगे. आज सुबह नैनी कुछ उदास थी, उसका दुःख देखकर आँख भर आयीं. दिल बहुत नाजुक शै होती है आखिर..और वह भी साधक का दिल..वह साधक है यह भी कैसे कहे, हाँ, उसके दिल में खुदा जरूर है, पर खुदा तो हरेक के दिल में है, हर जगह है, वही जानता है खुद को और वही जनाता है खुद को, उसका इसमें कुछ भी तो नहीं.


आज यात्रा की तैयारी के लिए कुछ और काम किये. जून भी बहुत उत्साहित हैं इस यात्रा को लेकर. सुबह उन्होंने कुछ धनराशि भी दी, कल कहा, झोली भर कर उपहार ले जाओगी तो झोली भरकर लाओगी. सचमुच एक बैग पूरा भर गया है, अभी भी शेष हैं. बुआ, चाची, मामी सभी को फोन किये पर किसी से बात नहीं हुई, अब घर जाकर ही सबसे बात होगी. कल पाकिस्तान में तालिबान ने पेशावर के एक आर्मी स्कूल के बच्चों पर बर्बरता पूर्वक गोलियां चलायीं. कितनी दहशत फैलाती हैं ऐसी घटनाएँ. निर्दोष बच्चों पर ऐसा अत्याचार हो रहा है और पाकिस्तान की सरकार बेबस है, अपने ही खोदे हुए गड्ढे में गिरने के लिए.  

Wednesday, August 16, 2017

जगन्नाथ मंदिर - डिब्रूगढ़


आज शाम को क्लब में मीटिंग है, वार्षिक उत्सव आने वाला है, सो देर तक चल सकती है मीटिंग. भोजन बना कर जाएगी, उसने सोचा. जून ने बताया, कल वे लोग डिब्रूगढ़ जायेंगे, भगवान जगन्नाथ का एक नया मन्दिर बन रहा है, दर्शनीय है, हूबहू उड़ीसा के पुरी मंदिर जैसा. उसमें प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम है. धीरे-धीरे यह मंदिर भी विशेष दर्शनीय व पूजनीय स्थल के रूप में प्रतिष्ठित हो जायेगा. नैनी ने आज बताया वह गर्भवती है, पर जितना काम करेगी उतना ही उसके लिए अच्छा है, जैसे पहले कर रही थी वैसे ही करेगी. उसकी हिम्मत देखकर अच्छा लगा. उसे लगा, वे लोग व्यर्थ ही डर जाते हैं, उसे खुद भी तो शुरू-शुरू में बहुत तकलीफ हुई थी, अपनी-अपनी समझ की बात है. उनके सारे दुःख वे स्वयं ही बनाते हैं.

आज सुबह मृणाल ज्योति गयी. ‘वर्ल्ड रिटार्डेशन डे’ था, झंडा फहराया गया. बच्चों के खेल हुए. वहाँ एक टीचर ने एमवे का कैटेलौग दिया, वह कुछ समय से यह काम कर रही है. एक अन्य टीचर ने बताया, उसकी चचेरी बहन अचानक ही गुजर गयी. अस्थमा था उसे, अपने जॉब में व्यस्त रहती थी, पति भी व्यस्त थे, ठीक से इलाज नहीं कराया. आजकल शहरों में जो लोग बारह-बारह घंटे काम करते हैं, अपने लिए समय निकालना कठिन होता है उनके लिए. इसी महीने यात्रा पर जाना है. दिल्ली होते हुए वह घर जाएगी और जून अपने दफ्तर के कार्य से राजस्थान. पिताजी का स्वास्थ्य अब पहले का सा नहीं रहा, वह यात्रा करना नहीं चाहते, उनसे मिलना अच्छा रहेगा. एक वर्ष पूर्व उनसे मिली थी. एक वर्ष में वृद्धावस्था में काफी परिवर्तन आ जाता है. तीनों भाभियों से बात की, सभी से मुलाकात होगी. उससे पूर्व गोहाटी जाकर पासपोर्ट का नवीकरण भी करवाना है. जून उसके लिए एक सुंदर जूता लाये थे, जो छोटा है, उसने हिंदी पढ़ने आने वाली छात्रा को भेजा है, उसे अवश्य पसंद आएगा.

आज मौसम अपेक्षाकृत ठंडा है. सूर्य देवता के दर्शन नहीं हुए, बदली बनी हुई है. कल ही वे इस वर्ष ठंड न पड़ने की बात कह रहे थे. दोपहर को ब्लॉग लिखा. कहानी अब नये दौर में आ चुकी है. सचमुच जीवन तो ज्ञान के बाद ही शुरू होता है, उससे पूर्व तो वे अंधकार में भटकते रहते हैं, बाद में उनके पास मशाल होती है. हिंदी के लेखों की प्रूफ रीडिंग करके उसने भिजवा दिए, पर सामने बैठकर गलतियाँ दुरस्त कराने के लिए बाद में एक दिन प्रेस जाना पड़ सकता है. ‘बाल्मीकि रामायण’ में भी नई पोस्ट लिखी., अभी बहुत कार्य शेष है पर एक  एक दिन तो पूरा होगा ही. नन्हे की कम्पनी तरक्की कर रही है, दिल्ली में उसके विज्ञापन लगे हैं. प्रैक्टो अब जाना-पहचाना नाम बनता जा रहा है. उसकी मित्र की माँ का फोन आया, उसे चिंतित न होने के लिए कहकर उन्होंने अपनी कविताएँ पढ़ने को भी कहा. पढ़ी हैं उसने, कई बहुत अच्छी हैं. उसे बाहर से बच्चों की पिटाई और उनके रोने की आवाजें आ रही हैं, बच्चों पर कितने अत्याचार होते हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है, और बच्चे अभिनेता भी होते हैं, इतनी जोर से रोते हैं जैसे जान ही निकल जाएगी..कोमल तन और कोमल मन वाले बच्चे...!


Friday, August 11, 2017

नीमराना का किला


रात्रि के नौ बजने को हैं. आज का इतवार अच्छा रहा. सुबह ध्यान में मन टिका. सुबह-शाम दोनों वक्त टहलने गयी, हवा में हल्की सुवास थी और शीतलता, एक कान पर हेडफोन लगा था, पर दूसरा इर्द-गिर्द की आवाजें भी सुन रहा था. इन्सान चाहे तो एक साथ सभी इन्द्रियों से काम ले सकता है, भीतर सभी को जोड़ने वाला एक तत्व जो मौजूद है. जैसे कम्प्यूटर पर एक साथ कई विंडो खोल लेती है वह. एक असावधानी अवश्य हुई, नाश्ता बनाने का काम उसने नैनी पर छोड़ दिया, जिसने सब्जी का मसाला जला दिया था, भोजन स्वयं ही बनाना चाहिए, भोजन बनाने वाले की तरंगें भी उसमें चली जाती हैं. आज शिवानी को सुना, पता चला, प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाना चाहिए. दोपहर को संडे क्लास में चालीस से ऊपर बच्चे आये थे. जिन्हें वह और एक सखी सहज ही सिखा पाए. उसने देखा है जिस दिन वह गहन विश्रांति का अनुभव करती है बच्चे शांत रहते हैं. जून ने फोन पर बताया, उनकी कांफ्रेस एक पहाड़ी पर स्थित किले में हो रही है. बहुत सुंदर जगह है पर इधर-उधर जाने के लिए काफी चलना पड़ता है और चढ़ाई भी करनी पड़ती है. सब्जी बाड़ी थोड़े से श्रम से साफ-सुथरी हो गयी है. गुलमोहर के पेड़ के नीचे छोटी सी पहाड़ीनुमा क्यारी बनाई है, माली ने उसमें धनिया लगाया है गोलाई में ! बगीचे में शंख ओढ़े कुछ जीव छोटी-छोटी पौध खा लेते हैं, उन्हें उठवाकर बाहर फिंकवाना है. फूलों की क्यारियों में कितने ही पौधे पिछले वर्ष गिर गये बीजों से अपने आप निकल रहे हैं, साल भर वे चुपचाप पड़े रहे, हर मौसम को सहते हुए और अब समय आने पर तैयार हैं खिलने के लिए, जैसे उनके कर्म के बीज समय आने पर फल देने लगते हैं. इस बार फरवरी में बगीचा फूलों से भर जायेगा !

वर्ष के अंतिम माह का प्रथम दिवस ! आज सुबह बड़े भाई को फोन किया, जन्मदिन की शुभकामनायें दीं. वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे थे. सेवानिवृत्ति के बाद दूसरा काम ले लिया है उन्होंने, पहले की तरह ही व्यस्त रहने लगे हैं. अभी-अभी भाभीजी को फोन किया पर उन्होंने उठाया नहीं, शायद सोयी हों. इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं. आज जून का प्रेजेंटेशन है, शाम को साढ़े पाँच बजे. अवश्य अच्छा होगा, दो दिन बाद वे आ जायेंगे और दिनचर्या पहले की सी हो जाएगी. आज तो नाश्ता साढ़े नौ बजे व दोपहर का भोजन दो बजे हुआ. शाम को वैसे ही देर होने वाली है, अन्नप्राशन भोज में जो जाना है. आज ब्लॉग पर दो पोस्ट डालीं. अब भी भीतर कुछ शब्द घुमड़ रहे हैं, कल से कितने-कितने अनुभव हो रहे हैं, उन्हें शब्दों में कह पाना कितना कठिन है, फिर भी प्रयास तो किया जा सकता है !  

‘विश्व विकलांग दिवस का आयोजन भी हो गया. कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. आज विश्राम है. कई हफ्तों बाद बाल्मीकि रामायण की पोस्ट भी प्रकाशित की. इस बार अभी तक क्लब की पत्रिका के लिए कुछ नहीं भेजा है, कल ही भेजेगी, कम से कम दो कविताएँ तो अवश्य. आज जून आ गये हैं, पर अभी तक घर नहीं आये, आते ही पहले हिंदी भाषा के पुरस्कार समारोह में चले गये, उनके विभाग को प्रथम पुरस्कार मिला है, उसके बाद दफ्तर. शाम ढलने को है, हवा में हल्की ठंडक है भाती हुई सी, झूले पर बैठकर लिखने की अपनी ही मस्ती है. झूला अपने आप ही झूल रहा है, कोई अदृश्य हाथ उसे झुला रहे हैं, जिसने उन्हें थामा हुआ है. वह परम अब भीतर-बाहर मूर्तिमान हो गया है, उसको पल भर के लिए भुलाना भी भारी पड़ता है, उसे भुलाने का अर्थ है स्वयं को भुलाना, यानि मूर्छा या प्रमाद, और प्रमाद ही तो मृत्यु है. जीवन अनमोल है, अनमोल हैं ये चंद श्वासें..और अनमोल है इनसे आती उस अनाम की सुवास !   



Thursday, August 10, 2017

एओल का आनंद उत्सव


आज शाम पांच बजे से उनका कोर्स शुरू हो रहा है. तेरह वर्ष पहले पहली बार ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ से जुड़ी थी, तब से अब तक जीवन में कितना परिवर्तन आया है, शब्दों में इसे कहना कठिन है. मन शांत है और बहुत से सवालों के जवाब भी मिल गये हैं. तन, मन दोनों की सफाई भी हुई है. आत्मा और श्वास के संबंध का ज्ञान हुआ है. प्राण ऊर्जा ही आत्मा को इस देह से बाँध आकर रखती है. मन ही खो गया है, पुराना वाला मन और परमात्मा से परिचय हुआ है..पर अभी भी बहुत दूर जाना है, क्योंकि वह अनंत है..उसकी ओर की जाने वाली यात्रा भी. कोर्स के अंतिम दिन का आयोजन भी कितना आनन्द दायक होता है सभी के लिए. आज मृणाल ज्योति के लिए वहाँ के एक कर्मचारी ने आंकड़े भेजे हैं. कुल डेढ़ सौ बच्चे हैं अब वहाँ, स्कूल आगे बढ़ रहा है. ‘विश्व विकलांग दिवस’ के लिए तिनसुकिया के एक स्कूल के बच्चों ने काफी अच्छे पोस्टर बनाये हैं. उन्हें कल धन्यवाद का पत्र लिखेगी. एक अन्य स्कूल के बच्चे और वहाँ की प्रधानाचार्या मृणाल ज्योति के बच्चों से मिलने आ रही हैं. सभी टीचर्स उत्साहित हैं.

‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर एक सखी के यहाँ रुके हुए हैं. उसने आज सुबह का नाश्ता बनाकर भेजा उनके लिए, वह एक विदेशी गोरे व्यक्ति हैं पर हिंदी और संस्कृत पर अच्छी पकड़ है. सभी को कोर्स में आनन्द आ रहा है. अंतिम दिन एक प्रतियोगिता है और समूह में सेवा का एक कार्य भी करना है. गुरूजी की तस्वीर के लिए फूलों की एक माला भी उसने बनवाई है नैनी से, शाम को लेकर जाएगी.

कोर्स पूरा हो गया और अंतिम दिन का उत्सव भी. आज सुबह प्रसाद रूप में एक अनोखा अनुभव हुआ, सद्गुरू की कृपा का प्रसाद अनवरत बरस ही रहा है. अब ठंड बढ़ गयी है. आज से गर्म वस्त्र निकाल लिए हैं. आलमारी में उसने मंगनी व शादी की साड़ियाँ देखीं, किनारे से रेशमी धागे निकल आये थे, पीको के लिए दीं तथा पल्लू पर झालर बनाने के लिए भी, इतने वर्षों बाद भी पहले सी सुंदर लग रही थीं. बगीचे में सर्दियों के फूलों की पौध भी लग गयी है. बोगेनविलिया अपने शबाब पर है और जरबेरा के फूल भी खिल रहे हैं. सब्जी बाड़ी में भी लगभग सभी के बीज व पौध लगा दिए हैं. कल से प्रतिदिन एक घंटा बाड़ी में बिताएगी ऐसा निर्णय लिया है. कल कम्पोस्ट खाद भी मंगानी है.

अगले हफ्ते आज ही के दिन विश्व विकलांग दिवस है, उसे उद्घोषणा के लिए स्टेज पर रहना होगा और दोपहर को हॉल की सज्जा के लिए भी जाना है. नन्हे ने उस दिन के लिए कुछ सहायता राशि भेजी है. उसने बताया, उसका एक मित्र लंदन से आया हुआ है. स्कूल के प्रबन्धक ने अपने पुत्र के अन्न प्राशन का निमन्त्रण भेजा है. आज लेडीज क्लब की मीटिंग में एमवे के उत्पाद का प्रस्तुतिकरण भी था. काफी तारीफ की उन्होंने. वे सौन्दर्य उत्पादों के साथ साथ स्वास्थ्य के लिए भी उत्पाद बनाते हैं. आज जून ने उसका एक पासपोर्ट साइज फोटो खींचा, पर उसे पसंद नहीं आया. अब चेहरे पर उम्र का पता चलने लगा है, जो कि स्वाभाविक ही है, पर आत्मा तो कभी वृद्ध नहीं होती, वह तो सदा ही एकरस है, सत्यम.. शिवम.. सुन्दरम ! जून आज एक कांफ्रेंस के लिए दिल्ली से आगे जयपुर रोड पर स्थित नीमराना जा रहे हैं. डिब्रूगढ़ का रास्ता रोका जा रहा है, ऐसी खबर सुनकर वह तिनसुकिया होते हुए जाने वाले थे कि किसी ने गलत सूचना दी, रास्ता खुल गया है, पर उन्हें लौटकर पुनः दूसरे रास्ते से जाना पड़ा. एअरपोर्ट पर सूचना भिजवा दी थी, किसी तरह वे लोग समय पर पहुँच पाए. असम में बंद व रास्ता रोको एक सामान्य घटना है पर इसका खामियाजा जिसको भुगतना पड़ता है, वही जानता है. आज प्रधानमन्त्री भी गोहाटी आ रहे हैं.


Tuesday, August 8, 2017

जीवन-चित्र-विचित्र


आज शाम को क्लब में मैजिक शो है. कल ‘गुरू पर्व’ है, ‘देव दीवाली भी’, दूरदर्शन पर वाराणसी से सीधा प्रसारण किया जायेगा, प्रधानमन्त्री भी जायेंगे. परसों वह दो अन्य महिलाओं के साथ दिगबोई व तिनसुकिया के स्कूलों में जायेगी. विकलांग दिवस के अवसर पर मृणाल ज्योति में एक चित्रकला व निबन्ध प्रतियोगिता के लिए निमन्त्रण देना है. सप्ताहांत में एक स्कूल में उसे वाद-विवाद प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में जाना है. लेडिज क्लब की पत्रिका के लिए लेख लिखना है. इस बार विषय क्लब से संबंधित होना चाहिए. बरसों से वह इसमें जा रही है. कितनी ही यादें हैं. लिखना शुरू करे तो कई पन्ने भर जायेंगे. जब इसकी सदस्या बनी थी, उस वक्त को याद करती है तो लगता है कल की ही बात है. आरम्भ में तो अधिक सक्रिय नहीं रही, केवल मीटिंग में सम्मिलित होना ही याद है. फिर एक दिन स्वरचित कविता का पाठ किया जिसके बाद सेक्रेटरी ने वार्षिक कार्यक्रम के लिए हिंदी में कुछ लिखने का काम दिया था. क्लब की पत्रिका में हिंदी लेखों के संपादन का कार्य भी कई बार किया. कितनी ही बार समूह गान में भाग लिया, जिनकी रिहर्सल में जाना एक यादगार अनुभव बन गया है. उन दिनों मीटिंग के बाद की चाय के लिए भोजन घरों पर ही बनाया जाता था. उसे याद है दोपहर को कुछ महिलाएं किसी एक घर में एकत्र होकर यह कार्य करती थीं. रात को भोजन बच जाने पर सभी के यहाँ पहुंचाया जाता था. तब से अब तक बहुत सा पानी गंगा में बह चुका है. अब लोग ज्यादा परिपक्व हो चुके हैं, अब भोजन कुक बनाते हैं परोसने का काम भी उन्हीं के लोग करते हैं. उस समय ज्यादा वक्त वेशभूषा तथा साज-सज्जा पर खर्च होता था, पर आज की महिला अपने को एक पूर्ण व्यक्तित्त्व मानती है. वह समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को पहचानती है, उन्हें निभाना चाहती है. क्लब द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न प्रोजेक्ट इसकी गवाही देते हैं.

आज मृणाल ज्योति के संस्थापक महोदय ने अपने जीवन के अनुभव बताये. बहुत रोचक और रोमांचभरी कहानी है उनकी. जीवन में उन्होंने इतने संघर्ष झेले हैं पर उनमें काम करने का जज्बा कूट-कूट कर भरा है. एक बार वह एक बस में यात्रा कर रहे थे. हाथ में रूसी लेखक बोरिस येल्स्तीव की पुस्तक थी. साथ बैठे व्यक्ति ने पूछा, यह पुस्तक कहाँ से मिली, तो उन्होंने कहा, खरीदी है, क्योंकि ऐसी किताबें पढने का शौक है’. उस व्यक्ति ने अपना पता दिया और मिलने को कहा. उन्हें एक सीक्रेट संस्था में काम मिल गया, मगर वह किसी को इस बारे में बता नहीं सकते थे, कोई पहचान पत्र नहीं था. पुलिस तक को पता नहीं था कि ऐसी कोई सरकारी संस्था है. उन्हें वैसी कई पुस्तकें पढने को दी गयीं. नक्सल आन्दोलन तथा गुरिल्ला युद्ध के बारे में जानकारी मिली. प्रशिक्षण दिया गया. उसी दौरान एक बार ऊँचाई से गिर गये, काफी चोट आई. छह महीने इलाज चला. जॉब जारी रहा पर बाद में तनाव बढ़ने लगा. गिरने के कारण सर में चोट आई थी, उसका भी असर था. नौकरी छोड़ दी. आगे पढ़ाई की और अध्यापक बने. उसी दौरान एक केस के सिलसिले में बड़ी बहन ने कहा, इस काम को ऐसे अंजाम दो, तब पता चला वह भी उसी संस्था में थी, अभी तक उसी क्षेत्र में है. घर में किसी भी पता नहीं था कि वह यह काम करती है. जीवन कितना विचित्र है, इतनी बड़ी धरती पर कब, कहाँ क्या हो रहा है, कौन जान सकता है.


कल जून वापस आ गये, घर जैसे भर गया है, पहले की दिनचर्या आरम्भ हो गयी है. आज एकादशी है, लंच में साबूदाने की खिचड़ी बना रही है. कल से ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का कोर्स आरम्भ हो रहा है. आज सुबह एक दु:स्वप्न देखा. मेहमान के लिए भोजन बना रही है पर बन नहीं पा रहा है. कभी जल जाता है कभी कुछ और समस्या. मेहमान भी वही है जिसके बारे में एक व्यर्थ विचार मन में जागृत अवस्था में आया था, अर्थात उस स्वप्न का बीज तब बोया गया था. उनके हर भाव, विचार तथा कृत्य का फल मिलता है. कर्म पर ही उनका अधिकार है, फल पर नहीं, फल तो भोगना ही पड़ेगा. यदि उस समय जग जाती तो स्वप्न टूट जाता. सद्गुरू के अनुसार इसी तरह अज्ञान की नींद से जगने पर भी भीतर के सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं. 

Friday, August 4, 2017

धनतेरस और नर्क चतुर्दशी


परसों वे लौटे. उसने यात्रा विवरण लिखना शुरू कर दिया है. पिछले वर्ष वे गोवा गये थे, आस्ट्रेलिया भी, तब भी लिखा था, और अब वह सब एक स्वप्न ही तो लगता है, यह जीवन एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं है. आज का स्वप्न कल से बेहतर है और यकीनन कल आज से भी बेहतर होगा. सुबह भविष्य में हरे-भरे बगीचे का स्वप्न देखा, जो एक दिन साकार होगा. माली के पीछे लगना होगा और नर्सरी भी जाना होगा. एक सखी से भी सहायता मांगी है, उसने पिछले वर्ष बहुत सुंदर बगीचा बनाया था. सुबह दीदी-जीजाजी के लिए एक कविता लिखी, ननद-ननदोई को विवाह दिवस की बधाई दी और एक सखी को पिछले हफ्ते पड़ने वाले जन्मदिन की बधाई आज जाकर दी, खैर, देर आयद दुरस्त आयद ! ‘कावेरी के सान्निध्य में’ लेख पूरा हो गया है, अब तस्वीरें डालनी शेष हैं जो जून की सहायता से ही होगा. जीवन एक इस सुन्दर अवसर को सुंदर कार्यों में में ही लगाना होगा. यहाँ हर पल अनमोल है. मृत्यु का देवता द्वार पर खड़ा ही है, प्रतीक्षा रत है, बल्कि पल-पल मृत्यु के द्वार की ओर वे बढ़ ही रहे हैं. जीना है तो इसी पल में जीना होगा.

आज एक सप्ताह बाद पुनः कलम हाथ में पकड़ी है. उस दिन दीदी के लिए एक कविता लिखी थी, आज दीवाली पर कुछ पंक्तियाँ उतरी हैं. सचमुच दीवाली एक नहीं कई उत्सवों का मेला है. सफाई लगभग पूरी हो चुकी है, अभी विशेष सजावट करनी शेष है. कल धनतेरस है अथवा तो‘धन्वंतरी जयंती, शाम को बिजली की झालरें लगवानी हैं. अभी-अभी नैनी ने पूछा, आपने धनतेरस पर कुछ खरीदा है ? शाम को बाजार भी जाना है. आज से मौसम में हल्की ठंडक समा गयी है. बचपन में दादी जी कहती थीं दीवाली के बाद सर्दियां शुरू हो जाती हैं और होली के बाद गर्मियां आरंभ हो जाती हैं. सुबह स्कूल गयी, बच्चों को व्यायाम करने में जितना आनंद आता है उतना ही भजन गाने में भी. परमात्मा का नाम किसी भी तरह लिया जाये, शुभ ही करता है. पिछले दिनी बगीचे में काफी काम हुआ, नर्सरी से नये पौधे लाये गये. जून भी कोलकाता से फूलों व सब्जियों के बीज लाये हैं. ‘विश्व विकलांग दिवस’ के लिए कुछ सामान बनाना है, पुराने शादी कार्ड्स उपयोग करके नये छोटे लिफाफे बना सकती है. विभिन्न स्कूलों में जाकर उस दिन के लिए विशेष रूप से बनाये बैज भी देने हैं.

आज ‘नर्क चतुर्दशी’ है. क्लब में आज ही दीवाली उत्सव मनाया जायेगा. आज नेट नहीं चल रहा, सो ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. परसों के विशेष भोज की तैयारी चल रही है. जून धीरे-धीरे सामान खरीद कर ला रहे हैं. वह सूरन के कोफ्ते की सब्जी बना रही है. इसके अलावा आलू-गोभी-मटर, बैंगन का भुर्ता, दाल माखनी, रायता, चटनी, पुलाव व पूरी बनाने की सोच रही है. कल अवकाश है, मिठाई बनाने का कुछ काम कल ही हो जायेगा. जून कोलकाता से स्नैक्स ले आये थे, कई तरह की चिक्की तथा नमकीन. बच्चों के लिए अनार व फुलझड़ी भी वे ले आये हैं, उसे शोर करने वाले पटाखे जरा भी पसंद नहीं आते. जून के दफ्तर से दीवाली के उपहार आने भी शुरू हो गए हैं. कल नन्हे से बात हुई, उसके यहाँ चार दिन का अवकाश है, पर उसे तो काम करना ही है. ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे, उन सभी को सद्बुद्धि दे ! इससे बढ़कर कोई प्रार्थना नहीं हो सकती.


Wednesday, August 2, 2017

अक्की रोटी और नीर दोसा









आज वे कूर्ग के एक रिजॉर्ट अमनवन में हैं, कावेरी नदी के तट पर स्थित यह एक हरा-भरा स्थान है. रंग-बिरंगे फूलों से लदी लताओं, वृक्षों और झाड़ियों से सजा यह स्थान पहली नजर में ही मन को भा गया है. यहाँ विभिन्न खेलों की सुविधाएँ भी हैं और स्विमिंग पूल तथा स्पा भी. फुटपाथ के किनारे जगह-जगह एकांत में बैठने के लिए चेयर टेबल रखे हैं, नदी किनारे उसकी ध्वनि सुनते हुए कुछ पढ़ने-लिखने का आनन्द लिया जा सकता है अथवा तो पंछियों की आवाजें ही सुनते रहें. दोपहर बाद सभी पर्यटकों को नदी पर ले जाया गया, रिवर ट्रैकिंग का अनोखा अनुभव पहली बार किया. तट पर बंधें वृक्षों से रस्सी को बांध दिया जाता था और उस के सहारे कई जगह से नदी पार करनी थी. कावेरी का स्वच्छ जल चट्टानों, वृक्षों की झुकी हुई डालियों को छूता हुआ बह रहा था, उसका कलकल नाद हृदय को आंदोलित करने वाला था. पानी का तापमान विभिन्न स्थानों पर भिन्न प्रतीत हुआ. ऐसा लगा जैसे प्रकृति कितने-कितने उपायों से विस्मित करना चाहती है, उस अनजान सृष्टा की याद दिलाती है. कावेरी के जल में पूरी तरह भीगकर जब वे लौटे तो शाम हो चुकी थी. संयोग की बात उनके कमरे का नम्बर वही है जो पिछले तेईस वर्षों तक घर का नम्बर रह चुका था.

यहाँ का स्नानघर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है. बड़े से बाथटब पर दिन में धूप तथा रात्रि में चाँद की रोशनी आ रही थी, छत पर शीशा लगा था. निकट ही शेल्फ पर किताबें पड़ी थीं. एलिस इन वंडर वर्ल्ड के ‘रैबिट इन द होल’ की तरह वे भी दुनिया से दूर एक अनोखी दुनिया में आ गये थे. रात्रि भोजन में ‘अक्की रोटी’ ‘नीर दोसा’ तथा केसरी भात के रूप में कूर्गी भोजन का आनन्द भी लिया.
आज वे ‘दुबारे’ नामक स्थान पर गये जहाँ हाथियों का एक कैम्प है, जिसमें उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है. कुछ देर रिवर राफ्टिंग की और फोटोग्राफी भी. लौटकर ‘कॉफी प्लांटेशन’ देखने भी गये, जहाँ कॉफ़ी के पौधों को छाया देने के लिए बीच-बीच में नारियल के पेड़ों पर काली मिर्च की लताएँ भी उगी हुई थीं. शाम को ‘निःसर्ग धाम’ देखने गये, जहाँ एक छोटा सा बाजार है, पशु घर तथा प्राकृतिक सुन्दरता भी. नदी पर बना रस्सी से लटकता पुल, सफेद खरगोशों की मासूम हरकतें और बारहसिंगों को हरी घास खिलाते लोग ‘निसर्गः धाम’ को यादगार बना देते हैं. लौटे तो अमन वन में पेड़ों के नीचे जगह-जगह जलते लैम्प, मोमबत्तियां व डालियों पर लगी रोशनियाँ वातावरण को एक रहस्य तथा गरिमा से भर रहे थे.

आज तीस किमी दूर मडिकेरी नामक पहाड़ी स्थान पर स्थित ‘abbey falls’ देखने गये, मडिकेरी से आठ किमी दूर पश्चिमी घाट पर स्थित यह झरनों का एक समूह है जो विशाल चट्टानों से जल की एक चौड़ी झालर बनाता हुआ अति वेग से घाटी में गिरता है और कावेरी में मिल जाता है. झरने के सामने रस्सियों पर लटकता हुआ एक पुल है जिसे खड़े यात्री जल फुहारों ला आनन्द लेते हैं. पास ही कॉफ़ी तथा काली मिर्च के बगीचे हैं. दशहरे के कारण लोगों की भीड़ यहाँ भी बहुत ज्यादा थी. वापसी में मैसूर में एक सम्बन्धी के यहाँ होते हुए रात्रि दस बजे बंगलुरु लौट आये, दो दिन बाद वापस असम जाना है.


Tuesday, August 1, 2017

कुर्गी साड़ी


सुबह आँखों की जाँच करवा कर दोपहर को वे सेन्ट्रल मॉल गये जहाँ एक बड़े भवन के आगे  विलेज – “रेस्तरां नहीं एक अनुभव” लिखा था. सारा हाल रंग-बिरंगी झंडियों से सजा हुआ था, जो जगह-जगह लगे अदृश्य पंखों से हिल-डुल रही थीं. एक गाँव का माहौल बनाया गया था, जगह-जगह छोटी-छोटी दुकानें थीं, चना जोर गरम, कुल्फी वाला, बिल्लू बारबर, पुलिस थाना और तो और एक जेल भी थी, ज्योतिषी और मेंहदी वाला भी था. बीच-बीच में साइकिल पर सवार होकर चाय वाला और और अन्य हॉकर भिन्न वेश-भूषा में सजे सामान बेच रहे थे. मुख्य भोजन स्टाल भी विभिन्न पकवानों से सजा था. लगभग दो घंटे वहाँ गुजारे. नवरात्रि के कारण वहाँ कठपुतली डांस तथा डांडिया नृत्य का आयोजन भी किया गया था.

फोर्टिस में “फुल बॉडी – मेडिकल चेकअप” कराने के बाद घर लौटे तो तीन बज चुके थे. घर में पड़ी एक किताब पर नजर गयी, प्रसिद्ध मॉडल याना गुप्ता की लिखी पुस्तक थी, स्वास्थ्य और भोजन से सम्बन्धित, आज ही वह डाईटीशियन से मिलकर आई थी सो उसमें उत्सुकता हुई, लिखा था, भोजन के प्रति गलत रवैया ही कई रोगों को जन्म देता है. कल इस्कॉन मन्दिर जाना है और परसों ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ आश्रम.

रात्रि के नौ बजे हैं, नन्हा अभी तक नहीं आया है, शायद रास्ते में होगा. इस कमरे में ठंडी हवा आ रही है, यहाँ शाम के बाद हवा में ठंडक भर जाती है, एक अजीब सी निस्तब्धता का आभास हो रहा है. आज सुबह भी झील किनारे घूमने गये. लौटे तो कुछ देर एक अलमारी की सफाई की, फिर मन्दिर गये. इस्कॉन मन्दिर की भव्यता देखते ही बनती है, काफी ऊँचाई पर बना है और कितने ही घुमावदार रास्तों से होकर जब मुख्य प्रतिमाओं के दर्शन मिलते हैं तो भीतर एक सहज पुलक भर जाती है. दोपहर का भोजन भी वहीं किया. वापसी में नन्हे के दफ्तर गये, एक बड़ी इमारत की चौथी व पांचवी मंजिल पर स्थित ऑफिस आयुध पूजा (विश्व कर्मा पूजा जैसी) के लिए सजा था, नवरात्रि के कारण शाम को यहाँ भी डांडिया  होने वाला था.

आज एक पुराने कन्नड़ मित्र के यहाँ गये, जिन्होंने दक्षिण भारतीय भोजन परोसा. खसखस, चावल व नारियल से बनी खीर बहुत स्वादिष्ट थी. उन्हीं के साथ श्री श्री के आश्रम गये. गेट पर ही कार की पार्किंग कर जब अंदर प्रवेश किया तो लोगों का हुजूम देखकर बहुत आश्चर्य हुआ. हजारों की संख्या में पंक्ति बद्ध लोग दूर तक पलकें बिछाये बैठे व खड़े थे, उन्होंने भी पंक्ति में खड़े होकर निकट से गुरूजी के दर्शन किये. कल उन्हें कूर्ग जाना है जो कर्नाटक का एक पहाड़ी स्थान है. उसने नेट पर पढ़ा, कूर्गी लोग सैनिक परंपरा से आते हैं और आज भी उन्हें हथियार रखने का अधिकार है. यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कूर्गी महिलाएं जो साड़ी पहनती हैं उसमें प्लेट्स पीछे की तरफ होती हैं तथा पल्लू किनारे पर लटका होता है.


Friday, July 28, 2017

अंकुरित सलाद का पैकेट


आज उनकी यात्रा का चौथा दिन है. शनिवार को सुबह असम से चले और दो उड़ानों के बाद रात्रि दस बजे बंगलुरू पहुँचे. फोन पर बात हुई थी तो नन्हे ने कहा था लेने आयेगा पर उतरने पर संदेश आया, गाड़ी भेज दी है. घर जाकर पता चला दोपहर को ही उसने एक डाइनिंग टेबल का आर्डर दिया था, दो घंटे में पहुंचने वाली है ऐसा कहकर पूरे छह घंटे लगा दिए दुकानदार ने भेजने में, उसी के इंतजार में घर से निकल ही नहीं पाया. जब वे पहुंचे तो डिलीवरी मैन बाहर निकल रहा था. पहली बार घर देखा, काफी आरामदायक है घर...भोजन कक्ष कम बैठक, दो छोटे कमरे, एक स्नानघर और ठीकठाक सा किचन. कमरों में काफी प्रकाश आता है और हवा के आवागमन का भी प्रबंध है. सफेद मार्बल का फर्श है, ज्यादा फर्नीचर नहीं है, बेड की ऊँचाई काफी कम है और एक कमरे में तो एक के ऊपर एक गद्दे रखकर ही बेड बन गया है. नन्हा अकेला रहता है कभी-कभी उसके मित्र आ जाते हैं सो जगह काफी है. उसने खाने का आर्डर भी कर दिया था, थोड़ी ही देर में मसाला भिन्डी, अरहर की  दाल और तन्दूरी रोटी के पैकेट पहुंच गये. बंगलुरू में दिन हो या रात चौबीसों घंटे भोजन मिल जाता है. 

इतवार की सुबह आसपास के किसी घर से आती आवाज से नींद खुली. यह काफी बड़ी सोसाइटी है, पंक्तियों में दुमंजिला घर बने हैं. घरों के आगे सुंदर बागवानी है इसी तरह पीछे व कहीं-कहीं छत पर  भी. जून प्रातः भ्रमण के लिए निकल गये और लौटे तो सब्जियां और फल लेते आये, आते ही दुबारा चले गये और दूध व कुछ और सामान, अब उन्हें तो घर का बना खाना ही भाता है. कुछ देर में निफ्ट में पने वाली भतीजी आ गयी और इंजीनियरिंग कर रहे दो भांजे भी, बंगलुरू में देश भर से बच्चे पढ़ने व नौकरी करने आते हैं. तभी घंटी बजी, नन्हे ने अंकुरित सलाद का आर्डर कर दिया था, यहाँ सभी के पास समय की कमी है शायद इसी कारण कटी हुई सब्जियां, सलाद आदि सब पैकेट बंद मिल जाता है, अब उससे कितना पोषण मिलता है यह तो शोध का विषय है. बहरहाल सलाद स्वादिष्ट था. बातें करते-करते समय का आभास ही नहीं हुआ, बच्चों ने खाना बनाने में सहायता की और लंच भी तैयार हो गया. तब तक एक पुराने मित्र का बेटा भी आ गया जिसे बचपन से बड़ा होते हुए देखा था. अब यहाँ रह कर जॉब करता है. कुछ देर आराम करने के बाद वे निकट स्थित एक झील पर टहलने गये, वर्षा के मौसम के बावजूद पानी बेहद कम था पर ज्यादातर जगह हरियाली से भरी थी. उसके चारों ओर लाल मिट्टी से बने फुटपाथ पर टहलते हुए सूर्यास्त के दर्शन किये.

सबका निर्णय हुआ निकट ही स्थित ‘टोटल मॉल’ में जाने का, बंगलुरू में हर तरह के अनगिनत छोटे-बड़े मॉल हैं. आकर्षक स्कीमों के साथ सुंदर परिधान और अन्य सभी आवश्यक वस्तुएं मिलती हैं, पर अक्सर जो वस्तु पसंद आती है उस पर कोई छूट नहीं होती. वापस आये तो डिनर का समय हो चुका था, नन्हे ने कहा आज सब्जी वही बनाएगा, सो जल्दी से खाना बन गया, बच्चों को अपने हॉस्टल वापस जाना था. उन्हें बस स्टॉप तक छोड़ने गये तो ठंडी हवा बह रही थी, जिसमें से आती हुई फूलों की खुशबू नासापुटों को छू रही थी. सड़क के किनारे, इमारतों के आस-पास  तथा घरों के बाहर लगे वृक्ष यहाँ के लोगों के प्रकृति प्रेमी होने की गवाही देते हैं.

Wednesday, July 26, 2017

अनानास की मिठास


उस दिन दिगबोई में भाई और उसके परिवार के साथ जब वे सब दिगबोई पीक पर थे एक तितली उसके माथे पर आकर बैठ गयी थी. उस समय तो महज एक सुखद आश्चर्य मात्र लगा था, पर बाद में सोचा तो लगा, वह कोई संदेश देकर गयी थी, उस अनाम का संदेश....कि वह सदा उसके साथ है, वही तो है. वह स्वयं अब नहीं रह गयी है. कभी-कभी अचरज भी होता है, अपना आप अजनबी लगता है, सारे विचार जो एक वक्त में बड़े कीमती लगते थे अब व्यर्थ ही लगते हैं. एक मौन पसरा रहता है भीतर जो अपना लगता है. शब्द भी नहीं गूँजते भीतर ! तभी तो कोई कविता भी नहीं लिखी कई दिनों से !

कल शाम आज की सेल की तैयारी में बीती. क्लब की तरफ से वर्ष में दो-तीन बार यह सेल लगती है. बड़े से हॉल में मेजें लगवाना फिर उनपर सफेद मेजपोश और विक्रेताओं के बैठने के लिए कुछ कुर्सियां, वस्त्र लटकाने के लिए लोहे के स्टैंड अदि रखवाना, कुछ अन्य महिलाओं के साथ सारा काम खत्म करते-करते आठ बज गये थे. आज सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को क्लब गयी. कुछ खरीदारी भी की. पता चला उसका नाप बढ़ गया है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ वे भोजन तो कम करते नहीं, व्यायाम कम कर देते हैं. घर का काम भी कितना कम रह गया है. जून कल दोपहर आ जायेंगे, जब वह बच्चों की संडे क्लास ले रही होगी. अब वह नहीं कहते कि उनके घर आने पर उसे घर में ही रहना चाहिए, वह आत्मनिर्भर बनते जा रहे हैं. नन्हा आज व्यस्त होगा, तीस घंटों के लिए एक प्रतियोगिता होने जा रही है, उसे आज सुबह वहाँ जाना था. आज बगीचे से एक अनानास तोड़ा, जिसे पक्षियों ने चख लिया था, मीठा है बहुत. घर में बगीचा हो तो कितना अच्छा है न..बड़ी भतीजी ने लिखा है, स्वर्ग की तरह है उनका घर, सचमुच ..स्वर्ग ही तो है, जहाँ देवता रहते हैं !


कल यात्रा पर निकलना है, अभी तक पूरी पैकिंग नहीं की है. जून आज बहुत व्यस्त हैं, उनकी नयी प्रयोगशाला का उद्घाटन होना है. सीएमडी आने वाले थे, अब तक तो हो गया होगा. शाम के पांच बजे हैं, लगातार होती वर्षा के कारण मौसम ठंडा हो गया है. वह पिछले एक घंटे से साहित्य अमृत पढ़ रही थी. ज्यादा बोलने वाली सखी का फोन आया, वह कलाकार है. पानी के रंगों से सुंदर चित्र बना रही है और फेसबुक पर पोस्ट कर रही है. अच्छा है, उसके जीवन को एक ठहराव मिलेगा इससे और ढेर सारा सुकून भी. कल वह ब्लॉग पर विदाई संदेश लिखेगी, वापस आकर ही होगा लेखन कार्य. इस दीवाली पर उन्हें काफी लोगों को बुलाना भी है. जीवन का यह कितना सुंदर मोड़ है, बैंगलोर में हो सकता है गुरू दर्शन भी हो जाये. सद्गुरू से एकत्व की अनुभूति हर क्षण होती है. अब कुछ करे या न करे भीतर एक से रंग(मौसम)रहते हैं. एक अटूट मौन और शांति..एक सहजता और एक अखंडता..एक असीमता भी..

Monday, July 24, 2017

कृष्ण जन्माष्टमी


आज कृष्ण जन्माष्टमी का अवकाश है. सुबह वर्षा हो रही थी, वे प्रातः भ्रमण के लिए नहीं जा सके. इस समय भी बरामदे में बैठ कर अनवरत बरसती जल धाराओं को निहारना अच्छा लग रहा है. पिछले दो दिन से वह मौन का अभ्यास कर रही है, भीतर का मौन भी घट सके इसलिए कुछ सुनना भी नहीं है. अभी कुछ देर पहले भीतर कविताएँ उमड़ रही थीं, अब लिखने बैठी तो कुछ याद नहीं आ रहा. जीवन में कब क्या घटने वाला है कोई नहीं जानता पर इतना तो तय है जो भी होता है वह उन्हें आगे ले जाने होता है. आज शाम को कुछ अन्य लोगों एक साथ क्लब जाना है, बाढ़ पीड़ितों के लिए जो सामान महिलाओं ने एकत्र किया है, उसे सहेज कर अलग-अलग थैलों में भरना है. जून ने उसकी उस दिन वाली कविता पढ़ी तो उन्हें अच्छा नहीं लगा, दुःख भरी कविता किसे अच्छी लगती है, पर जीवन में सुख भी है और दुःख भी. कविता तो आईना है, जो जैसा है, प्रकट हो ही जायेगा.

कई दिनों में मन में एक विचार था कि जून को एक पत्र लिखे, कई बातें जो कहनी हैं, कही जानी चाहिए आमने-सामने, नहीं कही जा पायीं. ये बातें ही ऐसी हैं कि इन्हें समझने के लिए एक स्थिर मन की जरूरत है और जब भी इस विषय पर बात हुई है, मन को स्थिर रख पाना सम्भव नहीं रहा है. मानव का जीवन क्रम एक अबोध बचपन से शुरू होता है, एक कोरी स्लेट सा होता है उसका मन, फिर वातावरण, परिवार व स्कूल, मित्रों आदि से उसे जो संस्कार मिलते हैं, वही वह बन जाता है और स्वयं को वही मानने लगता है. युवावस्था में देह में परिवर्तन होते हैं और प्रकृति के नियम के अनुसार (जैसे की सभी प्राणियों में होता है) विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण उत्पन्न होता है. इसे ही प्रेम मान लिया जाता है. हाँ, सहज ही मानव के भीतर प्रेम, आनन्द, सुख, शांति, पवित्रता आदि के प्रति लगाव होता है, पर वह कभी-कभी ही प्रकट होता है. प्रौढ़ावस्था तक आते-आते मानव को समझ में आने लगता है कि समय हाथ से निकल रहा है, अब कुछ ही वर्षों के बाद जगत से प्रस्थान करना होगा. वस्तुओं पर उसकी पकड़ ढीली होने लगती है, अहंकार भी छूटने लगता है, उसके भीतरी गुण ज्यादा प्रकट होने लगते हैं. यही वक्त है जब उसे यह जानना होगा कि वास्तव में जीवन का अर्थ क्या है ? क्यों इस संसार में इतना दुःख है ? क्यों मानव कुछ आदतों को बार-बार दोहराता है, क्यों वह भूलने लगता है. यही वक्त है जब उसे किसी मार्ग दर्शक की जरूरत होती है. जब उसे शरण में जाने की जरूरत होती है, क्योंकि कुछ ही समय में वृद्धावस्था उसे इसके लिए विवश करने ही वाली है.

आज जून दिल्ली गये हैं. टीवी पर आस्था चल रहा है वरना समाचार या कोई धारावाहिक चल रहा होता जिसे वह भी बहुत आनंदित होकर देख रही होती. इस समय वेद मन्त्रों की चर्चा हो रही है. परमात्मा निराकार है, वह एक ऊर्जा है, अचिन्त्य है, निर्विकल्प है. परमात्मा के विविध नाम उसके अनेक गुणों के आधार पर हैं. ब्रह्मा का अर्थ है जो सृष्टि की रचना करे. सर्व व्यापक तत्व विष्णु है और संहारक तत्व शिव है. अनंत काल से प्रतिपल ये तीनों कार्य चल रहे हैं.    


Saturday, July 22, 2017

दिगबोई गोल्फ फ़ील्ड


सुबह जून ऑफिस गये तो वर्षा हो रही थी, उसने एक घंटा ‘वर्षा ध्यान’ करते हुए बिताया, मन को अपने घर में कितना सुकून मिलता है. सुकून यानि एक ऐसा रस जो कभी घटता-बढ़ता नहीं. गणेश पूजा का उत्सव कल यहाँ सम्पन्न हो गया, अब दुर्गा पूजा के उत्सव की तैयारी है. दो दिन बाद मृणाल ज्योति जाना है, अपने स्कूल भी, इस बार शिक्षक दिवस मनाना है. उसके लिए एक कविता लिखनी होगी. उसने मन ही मन वे सभी बातें भी दोहरायीं जो वह भूमिका में बता सकती है. महान शिक्षाविद् डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में सन बासठ से यह दिवस मनाया जा रहा है. यह दिन शिक्षकों के उस अथक परिश्रम की याद दिलाता है जो वे विद्यार्थियों के हित के लिए अनवरत करते हैं. इस दिन विद्यार्थी अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. समाज को उन शिक्षकों का ऋणी होना चाहिए जो बच्चों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाकर उन्हें जीवन में निरंतर विकास के योग्य बनाते हैं. बच्चों को शिक्षित करना, संस्कारित करना, जीवन का निर्माण करना शिक्षक का ही कार्य है. कल से उसने गणित पढ़ाना शुरू किया है, अच्छा लग रहा है, धीरे-धीरे सब याद आ रहा है. जीवन कितना-कितना लुटाता है. उनकी ही झोली छोटी होती है जो समेट नहीं पाते वे.

आज सुबह सुना साधक को शास्त्र इसलिए पढ़ने चाहिए कि वे उन्हें उनकी स्थिति से अवगत कराते रहें. वर्षों पहले पहली बार ‘योग वशिष्ठ’ पढ़ी थी. आज से पुनः पढ़ना आरम्भ कर रही है. परमात्मा अनंत है, उसको जानना तो असम्भव है. उसकी एक झलक मात्र ही मिल जाती है कभी-कभी, वह भी उसकी कृपा से ! अगले हफ्ते मेहमान आ रहे हैं, वे लोग आयें तो उन्हें किसी असुविधा का सामना न करना पड़े उन्हें इसका ध्यान रखना होगा. नैनी के घर से झगड़ने की आवाजें आ रही हैं, नशा करके घर के आदमी लड़ने की सिवा कर ही क्या सकते हैं, नर्क इसी को कहते हैं.

पिछले दिनों कई अद्भुत स्वप्न देखे. कल स्वयं को देखा जब बहुत छोटी थी. एक-एक करके सारे संस्कार मिट रहे हैं. उनका दर्शन ही उनसे मुक्त कर सकता है. अभी भाई का फोन आया, वे लोग ट्रेन में बैठ चुके हैं, यात्रा का आरम्भ हो चुका है. कल वह यहाँ होगा परिवार के साथ, यह बात ही कितना सुकून देती है. कल के बाद पांच दिन एक सुखद स्वप्न की तरह बीत जायेंगे.

आज पूरे पांच दिन बाद कुछ लिख रही है. जिस दिन वे आये शाम को उन्हें लेकर आस-पास का इलाका दिखने ले गयी, फिर अगले दिन सुबह ही सैर करने वे रोज गार्डन गये, अभी कुछ ही पल हुए थे कि वर्ष शुरू हो गयी, घर आकर भी वे सभी देर तक भीगते रहे और गाते रहे, बचपन की स्मृतियाँ सजीव हो उठीं. उसके बाद वह उन्हें क्लब तथा को ओपरेटिव स्टोर ले गयी. शाम को जून ने आयल क्लेक्टिंग स्टेशन दिखाया. बाद में चाय बागानों में घूमने गये, सभी ने खूब तस्वीरें खिंचायीं. तीसरे दिन सब दिगबोई गये, जहाँ संग्रहालय, दिगबोई पीक, गोल्फ फील्ड तथा शताब्दी पार्क देखा. गोल्फ फील्ड में छोटी-छोटी पहाड़ियों से ढलानों पर लुढकते हुए नीचे आने के वीडियो बनाये जो वर्षों बाद देखने पर भी मन को हर्षित करेंगे. चौथे दिन वे सभी अरुणाचल प्रदेश गये, पांचवे दिन आगे की यात्रा के लिए वे सभी गोहाटी चले गये. परसों विश्वकर्मा पूजा है.   


Friday, July 21, 2017

गणपति बप्पा मोरया


कल जून का जन्मदिन है. उनके लिए एक कविता लिखनी है. आजकल वह बहुत खुश रहते हैं. दफ्तर में काम भी ज्यादा है फिर भी नियमित भ्रमण, व्यायाम आदि तो है ही. अपने जूनियर्स के साथ उनका संबंध बहुत स्नेहजनक है. आवश्यकता पड़ने पर अनुशासित भी करते हैं, सभी की भावनाओं का ध्यान भी रखते हैं. शॉपिंग करने में भी उन्हें बड़ा आनंद आता है. आजकल पैसों के मामले में बहुत उदार हो गये हैं. टीवी पर हास्य के कार्यक्रम भी देखते हैं. सबको लड्डू खिलाकर पन्द्रह अगस्त मनाने और झंडा लगाने का उनका जज्बा भी देखने लायक है. सबसे बड़ी बात अब उन्हें क्रोध नहीं आता उन बातों पर जिन पर पहले आता था. एक उन्नत भविष्य की ओर वह बढ़ रहे हैं.

झमाझम वर्षा हो रही है. एक बार ऐसा हुआ सुबह जब काले बादलों ने आकाश को पूरा ढक लिया, कितना अँधेरा हो गया था जैसे मन कभी-कभी किसी बात में पूरा आसक्त हो जाता है और आत्मा का सूर्य खिन भी दिखाई नहीं देता. अभी जब जून दफ्तर से लौटे तो मोटी-मोटी बूँदें पड़ने लगीं. गेट से बरामदे तक आते-आते वह भीग गये थोड़ा सा. छम-छम बरसती बूंदों का संगीत कितना मधुर है. हरियाली ऐसे गहरे हरे रंग में रंग गयी है. शाम यूँ भी होने को है.पंछी अपने घर लौटने को थे पर अब दुबक कर शाखाओं में बैठ गये हैं. आज सुबह स्कूल गयी, एक अध्यापिका ने कहा, वह कक्षा नवीं व दसवीं के बच्चों को गणित पढ़ाये, पर गणित से नाता टूटे तो वर्षों हो गये हैं, कोर्स भी बदल गया होगा. योग सिखाना ही सबसे सरल है, शांति की राह पर ले जाना ही सबसे प्रिय कार्य है. शेष कार्य तो हो ही रहे हैं. कल बड़े भांजे का जन्मदिन है, उसके लिए छोटी सी कविता लिखी है, जून अभी आकर उसे सजा देगें, फोटो आदि डालकर.

आज असम बंद है. गोलाघाट में असम व नागालैंड के लोगों के मध्य हुए दंगों के बाद पुलिस के अत्याचार के खिलाफ एजीपी ने बंद का आवाहन किया है. सुबह जून दफ्तर गये पर लौट आना पड़ा. वर्षा अभी होकर रुकी है, सब कुछ धुला-धुला सा लग रहा है. आज ब्लॉगस पर तीन पोस्ट डालीं, किसी-किसी दिन लिखने की गति अपने आप बढ़ जाती है और किसी दिन एक ही पोस्ट मुश्किल से लिखी जाती है. शाम को मृणाल ज्योति की मीटिंग है, बंद के कारण स्कूल तक जाना सम्भव नहीं होगा, इसलिए सारी कमेटी उनके घर पर ही आ रही है. छोटे भाई का जन्मदिन भी आने वाला है, उसके लिए भी एक कविता लिखी.

फिर एक अन्तराल ! कई दिनों से कोई नई कविता भी नहीं उतरी है. कागज-कलम लेकर बैठना ही नहीं हुआ. घर में रंग-रोगन व सफाई का काम चल रहा था, सब कुछ फैला हुआ सा था, अब जाकर कुछ ठीक हुआ है. अब भी काफी कम शेष है. छोटे भाई के आने में दस दिन शेष हैं, तब तक तो सब निपट ही जायेगा. गणेश पूजा का उत्सव चल रहा है इन दिनों. आज गुरूजी ने और कल शिवानी ने गणपति का असली अर्थ बताया. मिट्टी से बनी देह या शरीर के मैल से बनी देह अहंकार से ग्रसित होती है, फिर ज्ञान उस अहंकार को मिटा देता है और ज्ञान स्वरूप ही बना देता है. गणपति का सिर बड़ा है अर्थात ज्ञान भरपूर है. सूंड से भारी काम भी करते हैं और एक सुई भी उठा सकते हैं, अर्थात कोमल व कठोर दोनों हैं. चूहे पर सवारी करते हैं अर्थात तर्क (काटने की शक्ति) पर शासन करते हैं.